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योगिता यादव की कहानी ‘पीड़ का पेड़’

योगिता यादव हिंदी की जानी पहचानी युवा लेखिका हैं. अपनी कहानियों के लिए उनको ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार भी मिल चुका है. आज उनकी एक कहानी- मॉडरेटर 
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उस वीराने में एक पीड़ का पेड़ था। हर शाम वहां चिडिय़ों का झुंड इकट्ठा होता। वे इकठ्ठा होती या पत्तों के पीछे से उग आती नहीं पता ! उनकी चीं चीं की चहचहाहट से सारा गगन गूंजने लगता। उनके चहचहाहट के स्वरों में कभी मुक्त हो जाने के छंद होते तो कभी पीड़ की शहनाई बजती। शहनाई की तान जब खूब ऊंची उठ जाती तो चिडिय़ों की आंखें भर आतीं। पीड़ाओं का मवाद आंसू बन झर झर झरता। उन्हीं नमकीन आंसुओं से पीड़ का यह पेड़ खाद और पानी दोनों पाता। हौले हौले पीड़ का पेड़ खूब घना और हरा-भरा होता जा रहा था। उसके पत्ते और घने हो रहे थे, तना मोटा- खूब मोटा। कम से कम इतना तो था ही कि वह चिडिय़ों का झुंड और उनके स्वरों को संभाले हुए था। यह चिडिय़ां दिन भर यादों के झुटपुटे में गुम रहतीं। यूं लगता जैसे पेड़ पर कुछ है ही नहीं। सरसब्ज पत्ते, सिर्फ पत्ते ही दिखाई देते। धूप का सूरज ढलते ही हर पत्ते की ओट से कई-कई चिडिय़ां निकल आतीं और अपनी-अपनी तान में गाने लगतीं। सभी के स्वर एक हो जाते। जैसे एक हो जाती हो सबकी पीड़ा।
धूप का सूरज ढलने के बाद जब आसमान धीरे धीरे स्याही में उतर रहा था, ऐसी ही एक शाम पीड़ाओं के रुदन में सभी चिडिय़ां गर्दन ऊंची उठाए गा रहीं थी। तभी सयानी चिडिय़ा की आंखों से आंसू की जगह तेजाब झरने लगा। चिडिय़ों के झुंड ने सयानी चिडिय़ा के आंसू अपनी-अपनी आंखों में बांट लिए। और बोलीं, ”सयानी चिडिय़ा तुम हम सबको इतना प्यार करती हो। तुम्हें तो दुनियादारी के सब हुनर आते हैं। फिर तुम्हें पीड़ा ने कैसे आ घेरा। सच सच बताना तुम सिर्फ हमारे लिए आंसू इकट्ठा करती हो या ये तुम्हारे अपने हृदय से फूटते हैं।
सयानी चिडिय़ा भीगी पलकों के बीच ही हल्का सा मुस्काई और बोली ओ मेरी नन्हीं चिडिय़ों, आंसू कब तुम्हारे कब हमारे हुए हैं।
ये तो सबके सांझे होते हैं।
जैसे सांझी होती है वेदना,
जैसे सांझी होती हैं बेटियां।
जैसी सांझी होती है उनकी उड़ान
और सांझी होती है मुक्ति।
आंसू भी सभी के सांझे होते हैं। मेरे हृदय में भी वही सब छुपा है जो तुम सबके रक्त मांस में रोपा गया है।
एक गांठ है मेरे हृदय में जिसे मैं जीवन भर खोल नहीं पाई। बस वही गांठ जब तब दर्द बनकर चुभती रहती है।
तो खोलों ने वह गांठ, पीड़ के इस पेड़ पर सभी गांठें खुल जानी चाहिए…Ó सभी चिडिय़ों ने एक स्वर में कहा।
तो सुनो, ”मैं अपने कुल की पहली लड़की थी जिसने कविता लिखी। कविता… वह भी प्रेम कविता…. पूरे कुनबे ने मेरा बहिष्कार किया। मेरी कलम तोड़ दी, मेरी स्याही सुखा दी। मैं फिर भी न मानी। मैंने पगडंडियों के किनारे से सरकंडे तोड़े और उनकी खूब सुंदर कलमें बनाई। जलखुंभियों की लताओं को निचोड़कर स्याही बनाई और हरियाले प्रेम गीत लिखती चली गई। हाड़-मांस के पुतलों ने जब मुझे घर से निकाला तो दरियाओं ने अपनी लहरों पर पनाह दी।
मैं खूब मेहनतकश, जो ठान लेती उसे करके ही दम लेती। मैंने खूबसूरती तो हरगिज नहीं चाही थी। पर बिन मांगे ही ऊपरवाले ने झोली भर खूबसूरती दी। मां कहती थी मैं बचपन में भी गुलाब के फूल की तरह फूलों में अलग पहचानी जाती। कुछ कहते ब्यूटी विद ब्रेन। और कुछ कहते तैं सुंदर हूं इसलिए आगे बढ़ रही हूं। और मैं आगे बढ़ रही थी। सफलताओं के बादल दोनों बाहें फैलाकर मुझे अपने पास बुला रहे थे। इन्हीं बादलों के बीच से आया एक चांद का बुलावा। जिसकी फिजां में मेरे हुस्न और काबलियत के सितारे चमकने लगे।
मेरे सितारे टिमटिमा रहे थे, पर उसे लगने लगा कि मैं जान बूझकर उसकी आंखें चौंधिया रही हूं। जब वह गुस्से से भर जाता तो कहता मैं दिखती तो परियों जैसी सुंदर हूं पर मेरे भीतर चमगादड़ों सी कुटिलता है। मैंने मनुहार की, उसे मनाने को मधुर गीत सुनाए। वह खुश हो गया और बोला तुम जब गाती हो तो कितनी सुंदर हो जाती हो। हम दोनों ने मिलकर एक प्रेम कविता लिखी और कई-कई बार पर्वतों के शिखर से उस प्रेम कविता में झरनों की तरह बहे। जब-जब भी वह रूठ जाता मैं उसके लिए ऐसा ही एक मधुर गीत गाती। मैं प्रेम के नशे में थी और वह जमाने भर का नशा ढो रहा था। मेरी प्रेम कविताओं में उसके नशे की दुर्गंध घुलमिल जाती इससे पहले ही मैंने उसके नशे से अपने नशे को अलग कर लिया।
मैं फिर से प्रेम कविता लिखने लगी और वह नशा ढोने लगा। मेरी कविताएं बह रही थी, सबका जी चाहता उसमें गोते लगाने का। पर यह प्रेम कविता है, कोई खाला जी का घर थोड़े ही है। जिसमें जो चाहें अंदर आ जावे। कोई इन्हें देखता ही रह जाता तो कोई लहरों के आवेग से दूर जा गिरता। पर एक बांका तैराक आया जिसे लहरों से खेलने का हुनर आता था। हाय! मैं उसके तैरने के अंदाज पर फिदा हो गई। जिस उम्र में झुर्रियां चेहरों पर छाने लगती हैं, उस उम्र में मैंने उसके लिए अपने मुख पर चंदन के लेप लगाए।
मैं उसे तैरने को कहती तो वह कहता पहले एक प्रेम गीत सुनाओ… मैं मनुहार करती पर वो कहां मानता। मैं खुशी खुशी उसके लिए एक नेह भरा गीत लिखती… वह लहरों की कलाबाजियां दिखाता ….हम दोनों अपनी ही खुशियों में गुम थे। लहरों और कलाबाजियों के खेल में एक दिन वह हंसते हंसते बोला, ”तुम दिखती तो समझदार हो पर हो अव्वल दर्जे की मूर्ख। तुम क्या सोचती हो कि चंदन का लेप लगा लेने से तुम षोडशी दिखने लगोगी। जरा ध्यान से देखो तुम्हारी गीत भी तो अब झुर्रीदार होने लगे हैं। और अब उस पोटली में गीत बचे ही कितने हैं।ÓÓ कहते- कहते वह ठहाका लगाने लगा…..
उसकी वह कुटिल मुस्कान मेरे दिल में खंजर की तरह उतर गई। मैंने बदहवासी में अपनी पोटली जब खोली तो देखा उसमें गीत तो हैं पर उस मधुरता पर किसी ने तेजाब डाल दिया है। अपनी मधुरता ढूंढने मैं गीतों की पोटली लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ी पर वह हुनरबाज लहरों पर बाजीगरी करते हुए दूर बहुत दूर निकल गया। मैं अकेली रह गई उसकी यादों के तेजाब में। उसका इंतजार करते करते मैं इतना थक गई कि पोटली का वह सारा तेजाब मेरे जिस्म में उतर गया। मेरी सुंदरता और मधुरता सब उस तेजाब ने लील ली और अपने ही हाथों मैं खुद चिडिय़ा हो गई। और अब जब चिडिय़ा हो गईं हूं तो तुम पूछती हो कि ये आंसू किसके हैं। मैं भी नहीं जानती कि ये उसकी यादों का तेजाब बह रहा है या मेेरे मन के सवालों की नदी….. कहते कहते सयानी चिडिय़ा फिर से वेदना के स्वर में गाने लगी…. सयानी चिडिय़ा के साथ पीड़ के पेड़ पर बैठी सभी छोटी बड़ी चिडिय़ां गाने लगी और वेदना के स्वर से पीड़ का पेड़ झूमने लगा।
पीड़ के इस झूमते पेड़ पर तभी एक और चिडिय़ा आ बैठी। सुंदर सी, कोमल सी, पीड़ा के बोझ से दबी दबी सी। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी, उसका स्वर उसके गले के नीचे ही घोट दिया गया था। जिससे उसकी गर्दन एक तरफ को लटक गई थी। पर उसकी आंखें बोल रहीं थी…आंखों से गिरते आंसुओं को सयानी चिडिय़ा ने अपनी चोंच में भर लिया और उसकी टेढ़ी हुई गर्दन पर मरहम की तरह लगाने लगी। उदास चिडिय़ा का स्वर धीरे-धीरे खुलने लगा था वह बोली, ”मैंने क्या किया था, मैं तो यह जान ही नहीं पाई और उससे पहले ही मेरा गला घोंट दिया गया।ÓÓ
सयानी चिडिय़ा ने उस नन्हीं चिडिय़ा को अपनी गोद में उठाया और सहलाने लगी। तभी एक और चिडिय़ा वहां आई। उसकी आंखें इस कदर भिची हुई थी कि वह चिपकने लगीं थीं। उसकी गोद में एक ऐसी ही नन्हीं चिडिय़ा थी। सयानी चिडिय़ा ने अपनी गोद से नन्हीं चिडिय़ा को उतारा और डाली पर बिठा दिया। और फिर मुंदी हुई आंखों वाली चिडिय़ा की गोद से उसकी नन्हीं चिडिय़ा को अपनी नन्हीं चिडिय़ा के पास बैठा दिया। दोनों नन्हीं चिडिय़ा आपस में हिलमिल गईं और खेलने लगीं।
अब सयानी चिडिय़ा ने अपनी आंखों के आंसुओं से मुंदी हुई आंखों वाली चिडिय़ा की पलकों को धोया और धीरे धीरे उसे आंखें खोलने को कहा। मुंदी पलकों वाली चिडिय़ा ने अपनी आंखें धीरे धीरे खोली तो उनमें से आंसुओं की दो धाराएं बह निकलीं। वह बोली, ”कितने अरसे बाद आज मैंने अपनी आंखों से कुछ देखा है। वरना तो मुझे बंद आंखों वाली मशीन बने रहने का ही हुक्म था।ÓÓ
ऐसा क्यों, किसने दिए तुम्हें यह अमानवीय हुक्म?
डरो मत यहां तुम्हें कोई खतरा नहीं। इस पेड़ तक सिर्फ वही पहुंच पाता है जिसके पास पीड़ा है। तभी तो यहां सिर्फ चिडिय़ों का ही झुंड है। तुम बताओ क्या हुआ तुम्हेंÓÓ
सुबकते हुए चिडिय़ा ने अपनी व्यथा सुनानी शुरू की, ”मेरा चेहरा कभी किसी ने नहीं देखा था। मैं जब फेरों पर बैठी तो सहेलियों ने लंबा घूंघट मेरे मुख पर डाल दिया था। यह घूंघट हमेशा मेरे मुख पर पड़ा रहा। मैं घर में सबसे छोटी, पति के अलावा सिर्फ गांव की औरतों ने ही मेरा मुख देखा था। पता नहीं पति ने भी कभी ध्यान से देखा था कि नहीं। मेरे आने से पहले ही उसे कह दिया गया था, शहर की पढ़ी-लिखी है, चार भाइयों की अकेली बहन है, सिर चढ़ गई तो उतारनी मुश्किल हो जाएगी। उसने मुझे सिर नहीं चढ़ाया। मुझे किसी ने सिर नहीं चढ़ाया। मैं घर के बुजुर्गों की सेवा करती रही। एक के बाद एक तीन बच्चे पैदा किए, सबको प्यार दिया। सबसे छोटी तो अभी छह महीने की थी, मुझसे अलग ही न होती थी। हमारे घर की दूसरी बेटी थी। मेरी गोद के अलावा उसके लिए घर में कोई और गोद थी भी नहीं। वह मुझसे अलग हटकर करती भी क्या।ÓÓ
अपनी नन्हीं चिडिय़ा को डालियों पर फुदकते हुए देखकर उसकी जान में जान आई और वह कहने लगी, ”अपने ही नहीं जेठ-जेठानियों के बच्चों के लिए भी मेरी गोद प्यार से भरी रहती। बड़ों और बच्चों के बीच में एक चक्की भी थी। कबीर की इस चक्की पर मैं दिन भर पिसती रहती। पर कमाल की तरह ठठाकर कभी हंस नहीं पाई। मुझे हंसने की मनाही थी। कहते हैं हंसी घूंघट चीर देती हैं। अगर ऐसा होता तो भूचाल आ जाता। घर में भूचाल कब किसे भाए हैं। उस रात भी तो भूचाल ही आया था। जिसने मेरी कैद की सब दीवारें हिला दीं। मेरी बचपन की सहेली के घर बेटा हुआ था। मैंने उसके लिए ऊन के छोटे-छोटे बूट बुने थे। मन हुआ एक बार उसे देख आऊं। मैंने मां जी से पूछा तो उन्होंने कहा काम खत्म करके चली जाना। काम कभी खत्म हुआ है आज तक? फिर भी मैं लगी रही, चक्की चलती रही, मैं पिसती रही। पिसते-पिसते शाम के चार बज गए। मैंने अपनी छोटी गुडिय़ा को तैयार किया और चल पड़ी अपनी सहेली के घर। बरसों बाद जैसे झरना फूटता है ऐसे मिली थी हम दोनों। उसका फूल सा बेटा मेरी कली सी गुडिय़ा। मेरी बेटी उसके बेटे को अपनी गोद में लिए खिला रही थी। कब शाम के सात बज गए पता ही नहीं चला। इधर घड़ी की सूई और उधर आसमान में खिंचती जा रही स्याही, मुझे दहशत दे रही थी। सहेली बोली आज यहीं रुक जा, पर मुझमेें हिम्मत कहां बची थी अपने फैसले खुद लेने की। अपने फैसले खुद लेने वाली लड़कियां सिर चढ़ी होती हैं और घर बर्बाद कर देती हैं। ये घुट्टी दिन भर मेरी पहरेदारी करती। अब तो मैं दाल में नमक डालने से पहले भी मां जी से पूछती कि कितना डालूं। फ्रिज में चाहें सिर्फ गोभी पड़ी हो तब भी मैं मां जी से पूछती कि क्या बनाऊं। क्योंकि वो नाराज हो जातीं तो उनकी नाराजगी मेरी पीठ पर नील बनकर बरसती। मेरे पति को मेरी देह से कोई मतलब नहीं था। मतलब था तो सिर्फ काम से। काम कोई भी हो चलता रहना चाहिए। वो अंग्रेजी में कहते शो मस्ट गो ऑन।Ó फिर चाहें मशीन के पुर्जे घिस-घिस कर वेदना के स्वर में चूं चूं कर रहे हों। शो मस्ट गो ऑनÓ, ‘शो मस्ट गो ऑनÓ बस यही जपते जपते मैं सिर पर पैर रखकर दौड़ी। खाना बनाने का वक्त हो गया था। आठ बजे के बाद मां जी खाना नहीं खाती। जब तक घर लौटी मैं पति का गुस्सा उनके सिर पर सवार हो चुका था। वह गुस्से में भरे बैठे थे। उन्होंने आव देखा न ताव उनके हाथ में जो आया उससे मुझे पीटना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा मैं दिन छिपे कहां आवारा गर्दी कर रही थी। मैंने कहा मैं तो मां जी को बताकर गई थी, अपनी सहेली के घर, उसके बेटे को देखने के लिए। मां पलट गई, बोली मुझे कुछ नहीं पता। मैं मियां बीवी के बीच में नहीं पड़ती। जो कहो एक दूसरे से कहो। और मां मुझे मेरे थानेदार पति के हाथों पिटती छोड़कर अपने कमरे में चली गई। आज मेरे पिटने की इंतहा थी। मैं कभी उनके दिल में जगह नहीं बना पाई, लेकिन आज वो भी मेरे दिल से उतर गए। मेरा जी किया कि मैं इस पिटाई से ही मर जाऊं। या फिर मुझे दिल का दौरा पड़ जाए। बस कल की सुबह नजर न आए। मैं तीन भाइयों की अकेली बहन, शहर की पढ़ी-लिखी लड़की, जिसे प्यार के दो बोल किसी ने इसलिए नहीं बोले कि मैं सिर न चढ़ जाऊं। आज मैं रजाई की तरह धुनी जा रही थी। मेरे आत्मा की कपास फाहा-फाहा उड़ रही थी। मेरे दोनों बच्चे भूखे थे, ठगी आत्मा और पिटी देह को समेट कर मैंने बच्चों के लिए खाना बनाया। पति से माफी मांगी, उस आवारागर्दी के लिए जो मुझे पता ही नहीं था कि मैंने कब कर ली। उन्हें मनुहार करके खाना खिलाया। घूंघट की ओट से ही सास को खाना खिलाया। मेरी देह में अब भी प्राण थे। मैं कितनी ढीठ हो गई हूं। इतना पिटने के बाद भी मेरी देह की चक्की लगातार चल रही है। मैंने ढेर सा आटा गूंथा। देसी घी के टोकरी भर परांठे पकाए। मेरे बच्चे रुआंसी आंखों से मुझे देख रहे थे। मैं सबसे ज्यादा अपने बच्चों के सामने शर्मिंदा थी… मैंने उन्हें अपनी शर्मिंदा सी आवाज में लोरी सुनाई और वे सो गए। मैंने छुटकी को गोद में लिया। मैं घर में सबसे छोटी थी, आस पड़ोस में भी लोगों ने हमेशा मुझे घूंघट में ही देखा था। मैं उनके सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहती थी, सो मैंने साड़ी को मर्दाना धोती की तरह बांधा। और घूंघट को दोहरा कर डाठा मार लिया। ये मेरी जिंदगी की जंग थी, जो मुझे अकेले लडऩी थी। लडऩे की मुझे इजाजत नहीं थी, छोटी अब भी मेरी गोद में थी। रात के अंधेरे में डरते-डरते कांपती देह के साथ मैंने गांव के कुए में छलांग लगा दी। और इस तरह मैं चिडिय़ा हो गई। कहते कहते शर्मिंदा चिडिय़ा सुबकने लगी। उसमें अब भी घूंघट से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं आई थी। उसने अपनी पलकों से अपनी दोनों आंखों को फिर से ढक लिया।
सयानी चिडिय़ा ने फिर से शर्मिंदा चिडिय़ा की पलकें धीरे-धीरे खोली और वह सबके साथ मिलकर शहनाई के स्वर में गाने लगी।
रात बीत रही थी एक नई सुबह के इंतजार में। सुबह का सूरज अपने साथ खुशहाली लाता और चिडिय़ों का स्वर मंद पड़ जाता। सभी चिडिय़ां फिर से खो जाती यादों के झुटपुटे में। या कि गुम हो जाती किसी के इंतजार में।
अभी शाम ढल ही रही थी कि एक सुंदर सी चिडिय़ा कुछ कुछ बेहोशी में वहां लाई गई। दो चिडिय़ों के कोमल पंखों पर सवार।
सयानी चिडिय़ा ने हैरान होते हुए पूछा, ”इसे क्या हुआ, चिडिय़ा होकर ये उडऩा कैसे भूल गई। पंखों पर बमुश्किल अपने को संभाले हुए चिडिय़ा बोली, मैं तो बचपन से चिडिय़ा थी। खूब उड़ी। पर अब थक चुकी हूं। मुझे उड़ान में ठगा गया। अब उडऩे को मेरा जी नही चाहता। मैं किसी कोटर में बंद हो जाना चाहती हूं। खुद को अंधेरों में कैद कर देना चाहती हूं। लोग कहते हैं जब औरतें कैद में थी तो दुनिया ज्यादा सुखी थी। मैं उसी सुख को ढूंढना चाहती हूं इसलिए पंख होते हुए भी मेरा उडऩे को जी नहीं चाहता।
सयानी चिडिय़ा बोली, ”ये कैसी बात करती हो, लगता है तुम उम्र भर शिकारियों से घिरी रही हो। वरना उड़ान से बढ़कर कैद कैसे हो सकती है। कैद से मुक्त होना ही तो चिडिय़ा होना है।ÓÓ
हो सकता है आपकी बात ठीक हो, लेकिन मेरा अनुभव ही ऐसा रहा। मैं क्या करूं?
मेरी मां ने मुझे अपने दूध के साथ मुक्ति की कामना पिलाई। उसने मुझे सीने-पिरोने का नहीं उडऩे का हुनर सिखाया और मैं बहुत अच्छी उडऩ बाज निकली। मैंने अपनी उड़ान से कईयों को पीछे छोड़ा। मैं हवाओं के साथ पर तौल रही थी। पर एक दिन उड़ते-उड़ते मैं बहुत दूर निकल आई। इतनी दूर कि मुझे मेरे घर की गलियां भूल गईं। मैं भूल गई अपनी यात्रा की उडऩ पट्टी। मुझे तो बस उडऩे का जुनून था। फिर मैंने देखा एक पेड़ पर सतरंगी फूल खिले थे। उन फूलों की भीनी-भीनी सुगंध मुझे अपनी ओर खींच ले गई।
उसी पेड़ पर वहां एक बगुला बैठा। श्वेत धवल। सतरंगी फूलों के बीच हव श्वेत बगुला ऐसे लग रहा था मानो इंद्रधनुष के बीच चांद निकल आया हो।
बगुले ने मुझे रोकते हुए पूछा तुम कहां और क्यों उड़ी चली जा रही हो
मैंने कहा मुझे उडऩा अच्छा लगता है। हवाओं के साथ पर तौलना मेरा शौक है। मेरी मां ने मुझे दूध में मुक्ति पिलाई है।
बगुला बोला, ”अरे पगली ऐसी मुक्ति का क्या काम। अगर उड़ान ही पूरी जिंदगी का हासिल होती तो क्या मैं न ऊंचा उड़ पाता। जो मजा झुंड में, गहरे पानी में और पेड़ों की फुनगियों पर है वह तुम्हारी तरह आकाश में अकेले उड़ते रहने में कहां।
और क्या तुमने कभी प्रेम की कैद का स्वाद चखा है।
क्या तुम्हें यह सतरंगी फूल पसंद नहीं।
मैंने कहा, कैद होना मेरी फितरत नहीं। मेरी मां ने मुझे मुक्ति की कामना के साथ पाला है। मैं उसी में खुश हूं। पर यह सतरंगी फूल बड़े अनूठे हैं। क्या ये सब फूल तुमने खिलाए हैं।
बगुला बोला नहीं पर तुम कहो तो मैं ये सारे फूल तुम्हारे कदमों में बिछा दूं। और उसने एक सतरंगी फूल तोड़ कर मेरे बालों में सजा दिया। उस फूल की गंध मेरे रोम-रोम में उतर गई।
उडऩा जैसे मुझे वियोग लगने लगा। मैं दो-चार बार उड़ती और फिर से बगुले के आगोश में आ गिरती। मैंने उस सतरंगी फूलों वाले पेड़ पर एक घोंसला बनाया। नन्हें-नन्हें तिनके संजोए। लेकिन एक-एक कर बगुलों का झुंड उस पेड़ पर अपने पैर जमाने लगा। ये बगुले गहरे पानी की मछलियों का शिकार करते और मेरे घोंसले केे आसपास अपनी दुर्गंध बिखेरते। मैं उडऩा भी चाहती तो उड़ नहीं पाती। उनका झुंड मेरी उड़ान पर पहरे लगाए था। कभी सोचा दूर उड़ जाऊं पर सतरंगी फूलों की सुगंध मुझे वापस अपनी ओर खींच लेती। और एक दिन इसी सुगंध ने मेरी सांस रोक दी और मैं फडफ़ड़ा कर सतरंगी फूलों वाले पेड़ से नीचे जा गिरी। अपने घोंसले से दूर, बगुलों के झुंड से दूर। मुझे लगता है मेरी आत्मा, मेरी उड़ान उन्हीं सतरंगी फूलों में कहीं कैद हो गई है…..ÓÓ
कहते-कहते नन्हीं चिडिय़ा फिर बेहोश हो गई। सयानी चिडिय़ा ने सभी चिडिय़ों से थोड़ी थोड़ी उड़ान उधार ली और बेहोश हुई चिडिय़ा के परों पर छिड़क दी। चिडिय़ा फडफ़ड़ा कर उठी और एक-दो-तीन कई डालियों पर उड़ उड़ कर बैठने लगी। उसकी चोंच से खुशी के स्वर फूटने लगे और सभी चिडिय़ां उसके साथ एक स्वर में गाने लगीं।
टेढ़ी गर्दन वाली दम घुटी चिडिय़ा, मुंदी आंखों वाली शर्मिंदा चिडिय़ा, खूब ऊंचा उडऩे वाली नन्हीं चिडिय़ा। अपनी-अपनी कैद से मुक्त होने वाली तमाम चिडिय़ां शहनाई के स्वर में गाने लगीं। पीड़ाओं का स्वर लगातार ऊंचा हो रहा है। स्वरों का एक वृत्त पीड़ के पेड़ से उठता हुआ सीधे आकाश में जा मिला। और लोग बावरे कह रहे हैं कि धरती के प्रदूषण से ओजोन परत का छेद लगातार बड़ा होता जा रहा है।
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योगिता यादव<

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