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आदिवासी समाज के बिसरे गिरमिटियाओं की भूली दास्तान

जब भी गिरमिटिया मजदूरों की बात होती है, हमारे सामने ऐसे किसी मजदूर की जो छवि उभरती है वह भोजपुरी समाज का होता है। अभी तक जो भी बहुचर्चित साहित्यिक लेखन सामने आए हैं, उनमें भोजपुरिया गिरमिटियों के बारे में ही खास तौर पर बात हुई है। लेकिन जो झारखंडी आदिवासी मजदूर बाहर गए, जिनको हिल कुली कहा गया, उनके बारे में कहाँ बात होती है? वे कहाँ और क्यों खो गए हमारी चिंता और चर्चा से? सोचने की बात तो है।
हिल कुली कोंता की कहानी पढ़िए अब माटी माटी अरकाटीउपन्यास में, जिसे बहुत दिलचस्प ढंग से अश्विनी कुमार पंकज (AK Pankaj ) ने गहरी छानबीन के बाद लिखा है। यह उपन्यास आदिवासी समाज के इतिहास के भूले-बिसरे संदर्भों को नए सिरे से सामने ला रहा है।
राधाकृष्ण प्रकाशन से पेपरबैक संस्करण में प्रकाशित इस किताब की कीमत 250/- रूपय हैं। फ़िलहाल इस किताब की अमेजन पर प्री-बुकिंग शुरू हो चुकी है और 10 जून से अमेजन इसे पाठकों तक पहुँचनाना शुरू कर देगा।   
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माटी माटी अरकाटी
वह उस औरत को नहीं जानता थालेकिन अब वह उसकी थीजो दो सप्ताह पहले उसे दी गई थी और जिसके साथ वह पिछले दस दिनों से रह रहा था-  बिना एक-दूसरे को जाने। बिना उसका चेहरा देखे।
और अबजबकि उसकी आंखें मुंद रही थींसिर पर दूर-दूर तक पसरा नीला आसमान तेज़ी से धुंधलाता जा रहा थाउसके कानों तक पहले उस औरत की हल्की चीख आईफिर उसका बिखरता हुआ गोल-सा चेहरा दिखा जिसकी पतली नाक के नीचे रखा हुआ एक अधखिला पलाश का फूल समुद्री हवाओं से थरथरा रहा था।
इसके बाद घुप्प अंधेरा छा गया।
उसे लगाउसकी देह बेजान हो गई है और लहराती हुई चारों ओर फैले हुए अथाह पानी में आखिरी ठिकाना ढूंढ़ने के लिए तेज़ी से नीचे गिर रही है। जीवन के इस सबसे भयानक पल में उसे अपने पुरखे याद आएकुछ ही दिन पहले जिन्हें वह उन जंगलों और पहाड़ों पर छोड़ आया थाजो उससे मीलों दूर थे।
उसने पुरखों को धन्यवाद कहने के लिए अपने ओठों को खोलना चाहापर वे महुए की तरह सूखकर बिलकुल छोटे हो गए थे और आपस में इस तरह से चिपक गए थे कि ज़ोर लगाने के बाद भी नहीं खुले। तभी उसे महसूस हुआउसकी गिरती हुई देह को पुरखों ने थाम लिया है।
इसके बाद उसे कुछ भी भान नहीं रहा। हवापानी और आसमान सब कुछ स्थिर हो गया। हर चीज ठहर गई थी। शायद सांस भी।
वह पूरी तरह से अचेत हो गया था।
डूबते हुए सूरज का लाल रंग तब पानी में फैल रहा था।
उसका नाम कोंता था और वह औरत जो कंपनी के रजिस्टर के अनुसार उसकी औरत थी और अचेत होने तक जिसकी सूरत भी ठीक से नहीं देख सका थाकुंती थी।
तीन दिन बादजब चांद और समंदर के पानी का रंग रात के किसी पहर में घुल-मिलकर एक हो रहे थेकोंता को होश आया।
सबसे पहले झिलमिलाते हुए तारे दिखे। नज़रें फेरीं तो वही औरतजिसके चेहरे पर उसने अचेत होते-होते अधखिला पलाश का फूल थरथराते देखा थावह दिखी। परछाईं की तरह हिलती हुई।
उसने उठने की कोशिश की तो उस औरत ने उसकी छाती पर धीरे से हाथ रख दिया। कोंता ने उठने का कमजोर प्रयास छोड़ दिया। उसका शरीर बुखार से तप रहा था। जी मिचला रहा था। सांसें बेतरतीब ढंग से मीलों दौड़कर आए हुए आदमी की तरह रह-रहकर हांफ रही थीं। कोंता को महसूस हुआउसके शरीर में पानी की एक बूंद भी नहीं बची है। उसकी तपती हुई देह पानी की तड़प से थरथराई। सूखे ओठों पर नमी तलाशती हुई जीभ मछली की मानिंद इस छोर से उस छोर तक घूम गई।
औरत को लगावह पानी पीना चाहता है। उसने कांच की बोतल से अल्युमीनियम के कटोरे में थोड़ा-सा पानी डाला और उसके सिर को सहारा देकर ऊपर उठायाताकि वह पानी पी सके। फिर दूसरे हाथ से पानी का कटोरा उसके मुंह से लगा दिया। मुश्किल से कोंता पानी के दो-चार घूंट गले के नीचे उतार सका।
पानी पीते हुए कोंता जीवन में पहली बार किसी औरत की गोद में था। नर्म मुलायम घास की तरह थी उसकी गोद। मां की गोद जैसी। उसने गौर से औरत का चेहरा देखा। लेकिन रात के अंधेरे में बेहोश होने से पहले जैसी ही साफ-साफ नहींउसकी अस्पष्ट धुंधली छवि दिखी। गोल चेहरे पर पतली नाक के नीचे रखा हुआ अधखिला पलाश का फूल। उसने आंखें बंदकर गहरी सांस ली। फेफड़े में घुसती हुई नमकीन हवाओं में उस औरत की मीठी गंध घुली हुई थी।
कोंता जागा हुआ था। जब कुंती उसके पास पहुंची तो सुखरामरुंगताबुधुठेबलेऔर एतो आदि दस-बारह लोग उसे घेर कर बैठे थे। ठेबले और एतो ने सरककर कुंती के लिए जगह बना दी। थोड़ा सकुचातेखुद को समेटते और घूंघट को थोड़ा ऊपर उठाते हुए वह कोंता के सामने बैठ गई। कोंता अचकचा गया। उसने अब से पहले उसका चेहरा देखा ही नहीं था। जाने कौन औरत है! चरका है। बिलकुल दिकू लोगों की तरह रंग-रूप। उसने सवालिया नज़रों से ठेबले को देखा। ठेबले समझ गयावह कुंती को नहीं पहचान पा रहा है। चूंकि कुली डिपो में और यहां डेक पर भी औरतें घूंघट में रहती थीं इसलिए ठेबलेउसके साथी और दूसरे पुरुष लोग भी उनका चेहरा नहीं देख पाते थे। कपड़े से उन्हें पहचानना मुश्किल थाक्योंकि जहाज पर चढ़ने से पहले उन सभी को एक ही तरह के कपड़े दिये गए थे। औरतों को बिना रंग वाली धोती और एक-एक कुरती। आदमियों को धोती के साथ कुरता। साथ में ओढ़ने-बिछाने के लिए एक-एक चादर। लेकिन कल शाम जब कोंता बुखार से बेहोश होकर डेक से गिरनेवाला था और बदहवास कुंती दौड़कर उस तक पहुंचकर चीखी थीउस समय उसका पल्लू पूरी तरह से सरक गया था। तभी ठेबलेरुंगता और डेक पर खड़े कई लोगों ने उसका चेहरा देख लिया था।
इसलिए कुंती के पास आने के बाद जब कोंता ने कौन है’ के अंदाज में ठेबले की तरफ देखा तो ठेबले और रुंगता दोनों के ओठों पर शरारती मुस्कान दौड़ गई। ठेबले कोंता से कुछ कहताइससे पहले रुंगता कुड़ुख (उरांवों की भाषा) में बोल पड़ा, ‘ईस एंग्ग नासगो तलिदस’ (यह हम सबकी भाभी है)।
कोंता नहीं समझ पाया। उरांव होते हुए भी वह अपनी भाषा कुड़ुख नहीं जानता था। चडरी और चुटिया के आसपास के उरांव लोग मुंडा समुदाय के साथ-साथ रहते अपनी भाषा भूल चुके थे। वे सब मुंडारी ही बोलते थे।
कुंती को उनकी बातचीत बिलकुल समझ नहीं आई। एक भी शब्द पल्ले नहीं पड़ा। न जाने कैसी बोली-भाषा है! जरा भी समझ में नहीं आनेवाली। पर लगा कि शायद उसके बारे में ही बात हो रही हैइसलिए जब आखिरी बात सुनते ही कोंता थोड़ा लजा गया तो उसकी देह भी गनगना गई।
कुंती ने उसके माथे पर हाथ रखा। बुखार नहीं था।
कोंता अब एकटक उसी को देख रहा था। पतली देह पर गोल चेहरा। चांद की रंगत काजिस पर पतली नाकपतले-पतले ओठ और किसी टोंगरी’ की तरह उभरी हुई भरी-भरी छातियां। वह उसके यहां की औरतों की तरह गठी-कसी नहीं थी। नदी के किनारे की नरम मुलायम मिट्टी जैसी।
शरमाई और छुपी नज़रों से जब कुंती ने लगातार कोंता को अपनी ओर देखते पाया तो छुईमुई के पौधे की तरह वह और सिकुड़ गई। जाने कौन देस का है! बिलकुल करिया तो नहीं लगताजबकि उसके साथी लोग तो एकदमे कुच-कुच करिया हैं। इसका रंग जरा-सा साफ है। तांबे जैसा। उसके अपने देस के मर्दों की तरह लुसुर-पुसुर’ नहीं। तगड़ा सुडौल जवान। नाक चौड़ी,ओठ मोटे और छाती छोटी चट्टान की तरह सख्त। बांहों की मछलियां कसी-कसी। बीमार पड़ने के बाद भी इसका देह लट-पटनहीं हुआ है। और उम्रउम्र तो उसी के बराबर बुझा रहा है। शायद एक-दो साल बड़ा। कौन जाने छोटा ही हो! दहाज के लोग कहते हैंई सब जंगली लोग हैं। छोटानागपुर देस का रहनेवाला। कलकत्ता से पूरब दिसा में ऊ देस है। धनखेती नहीं है उधर। खाली जंगले-पहाड़ है का तो। जंगले का आम-कटहर और जनावर खाते हैं ई लोग। कीड़ा-फतिंगा कुछो नहीं छोड़ते हैं। हे बिधना! कोनों जोड़ नहीं है। कैसे रह सकेगी वह इस जंगली आदमी के साथ?
कुंती की नज़र समुद्र के हिचकोले पर थी। जैसे-जैसे हिचकोले उठते-गिरतेउसकी धड़कन भी कम-ज्यादा होती। वह कोंता’ के सच को स्वीकार नहीं कर पा रही थी।
यही हाल दूसरी औरतों का भी था। जमुनीतिलियामगनीधनवंती और रेबनी शादीशुदा थीं और अपने मर्दों के साथ सफर कर रही थीं। फुलवरियामुनियाइमरतीरमियासुकमीरामदुलारी और कंगना अविवाहित थीं। कुंती और जोगतीदोनों विधवा थीं। कंगनारामदुलारीधनवंती और कुंती सवर्ण जातियों से थीं। बाकी सब लोअर कास्ट से।
कलकत्ता कुली डिपो के रजिस्टर के अनुसार जहाज पर चढ़ने वाली सभी औरतें शादीशुदा थीं और अपने-अपने हसबैंड’ के साथ स्वेच्छा से पांच साल के कांट्रेक्ट पर मजदूरी करने मॉरिशस जा रही थीं। लेकिन सच्चाई यही थी कि पांच विवाहितों को छोड़कर बाकियों से बिना उनकी इच्छा जानेउनसे पूछेऔर जाति-धर्म को ताक पर रखकर उन्हें अनजान पुरुषों के हवाले कर दिया गया था।
कलकत्ता डिपो में मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर करने से दो दिन पहले जब आठों को आठ मर्दों के सामने खड़ा किया गया था,कुंती भी अन्य अविवाहित औरतों की तरह कुछ नहीं समझ पाई थी कि क्या हो रहा है और क्या होनेवाला है। बंदूकधारीबरकंदाज’ के साथ दफादार जब भी आताऔरतें डर जाती थीं। पता नहीं किसलिए आए हैं और उनके साथ क्या करेंगे! घूंघट में रहने के कारण बहुधा वे बस अंधों की तरह अपनी परिस्थिति और परिवेश से अनजान होतीं। जो कहा जाताउसे चुपचाप मानने के लिए मजबूर।
कुछ पल खड़ा रहते हो गए तो फुलवरिया ने ही दफादार से घिघियाते हुए पूछा था, ‘ए भइयाहमनी के काहे ल ई अदमियन के सामने ठाड़ा करले हऽ?’
वह दफादार छपरा भोजपुर का था। औरतों के डिपो की ज़िम्मेदारी उसी पर थी। कुछ भी कहना-सुनना उसी से होता था। बोला, ‘अभी बियाह होगा तोहिन के।
सुनते ही औरतें भक्क हो गईं। वे सब घूंघट में थीं और अपने सामने खड़े पुरुषों को ठीक तरह से देख भी नहीं पा रही थीं कि कौन कैसा है। जवान है कि बूढ़ा है। लगीं सब रोने-धोने। सामने खड़े पुरुष भी दफादार की बात सुनकर घबड़ा’ गए थे। वे भी आपस में खुसर-फुसर करने लगे।
कुंती को तो जैसे काठ मार गया। बियाह क्योंकौन होते हैं ये लोग उसका बियाह कराने वालेऔर कोई कैसे बिना गांव-जवार,जाति-धरम जाने…उसे अपनी स्थिति किसी बेस्वा की तरह लगने लगीजिसे वेश्यावृत्ति के लिए ज़बरदस्ती कोठे में ला खड़ा किया गया हो!
औरतों का रोना-धोना जब बढ़ने लगा तो दफादार खूंखार ढंग से चीखा, ‘चोप्प! बंद करो नकियाना। नाहीं तो सबके गंगाजी में डुबा के मार देंगे।
22 साल की मुनिया दफादार के सामने आकर खड़ी हो गई। केकरा जीयेला हइहमनी अदमी ना हियइ काकइसे कर लेम कोनों आन अदमी से बियाहहम डूबे ल तेयार ही। हिमत हवऽ त ले चलऽ!
उसकी इस दिलेरी पर दफादार मुस्कुराया। मूंछांे को ऐंठते हुए कड़का, ‘ले जाइब। एतना जल्दी का बा। पहिले बढ़िया से तोहरा के चार अदमी घोटिहें-पिसीहें। फिन नु डुबाब हो।
दफादार की धमकी असरदार थी। गुस्से से उबलती गरियाती हुई मुनिया अपनी जगह पर जाकर खड़ी हो गई।
पुरुष लोग चुपचाप थे। वे भी इस तरह की शादी के लिए तैयार नहीं थे। पर बेबस थे। कैद में थे और यहां उनकी ना का कोई मतलब नहीं था।
न औरतों को समझ में आया और न पुरुषों को कि बियाह कैसे हो गया। मंतर भी नहीं पढ़ा गयान ही गांठ बांध के फेरा-उरा हुआ। फस्ट विद फोरथ’…ई कैसा सादी हुआयह भी नहीं मालूम चलाकौन किसका जनाना और कौन किसका मरदाना है?’
दफादार को उन सबकी हालत देख मजा आ रहा था। वह जानता थाउनके मन में कैसे-कैसे सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं। आंख नचा-नचा के और सिर घुमा-घुमा के मर्दों की तरफ देखते हुए कहने लगा, ‘यही न सोच रहे हो कि सब तो घूंघट में हैं। कौन किसका मेहरारू कैसे चिन्हबऽमरीच देस में घुंघटवा उघार के हाथ पकड़ा देंगे साहब लोग। बाकी दहाज पर तुम लोग का मरजी। साहब का भासा तो बूझे नहीं। इसलिए हमहीं बता दे रहे हैं। याद कर लो बढ़िया से।
उसने नाम गिनाना शुरू किया, ‘फुलवरिया का मरद चैतामुनिया का दीनाइमरती का ऊ जे लाइन में तीसरका लंबर पर खड़ा हय मतलु। बेचन का मेहरारू हुई सुकमी। रामदुलारी का बियाह अलगु से अउर कंगना रहेगी गजाधर के संग। जोगती का अदमी हय नानू अउर कुंती घर बसाएगी कोंता के संग। बाकी बच गइली रमिया। तऽ ऊ हमार संगे एहिजे रही।’ फिर ज़ोर से ठहाका मारकर बोला, ‘ना…हम त मजाक कइनी हऽ। रमिया के बियाह भइल बा लोटुआ के संग।
औरतों की पहचान करने के लिए दफादार जिसका नाम लेताउसकी ओर लाठी से इशारा कर देता। जब उसने कुंती का नाम लिया तो कोंता ने गौर से कुंती को देखा। सिर से पांव तक ढकी कुंती के पैर में बिछिया थी। उसने उसी बिछिया को अपनी आंखों में सहेज लिया।
कुंती का दिलोदिमाग तो सुन्न था। कोंता सुनने पर भी उसके मन में कोई हलचल नहीं हुई न कोई उत्सुकता कि

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