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प्रेम, जूनून, जाति, व्यवस्था और ‘मांझी’


फिल्म
‘मांझी: द माउन्टेनमैन’ की कई समीक्षाएं पढ़ी. युवा लेखिका विभावरी की यह टिप्पणी उस फिल्म पर सबसे सम्यक लगी, फिल्म के बहाने उस पूरे राजनीतिक सामाजिक सन्दर्भों के साथ जिसमें दशरथ मांझी पैदा हुए. जरूर पढ़ा जाने लायक आलेख- मॉडरेटर============================
इस फिल्म पर लिखने से पहले मेरा इतने पशोपेश में होना यूं ही नहीं था!  ‘मांझी’ फिल्म के कथानक और दशरथ मांझी की असल ज़िंदगी के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों का अलगाव इसका कारण था! फिल्म पर लिखने से पहले दशरथ मांझी पर जानकारी जुटाने के क्रम में उन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री देखी| यह डॉक्यूमेंट्री कहती है कि दशरथ मांझी के पहाड़ तोड़ने की प्रेरणा उनकी पत्नी की मृत्यु नहीं थी बल्कि पहाड़ से फिसल कर पत्नी का घड़ा फूट जाना थी| इस दुर्घटना में उनकी पत्नी को चोट भर आई थी! यही डॉक्यूमेंट्री कहती है कि इतने बड़े निर्णय के पीछे केवल पत्नी का प्रेम भर नहीं था! बल्कि इस पूरे घटनाक्रम का एक सामाजिक पहलू भी रहा है| दशरथ मांझी के इस निर्णय में कहीं न कहीं उस समाज की पीड़ा भी शामिल थी जिससे उनका अभिन्न सम्बन्ध रहा| इस सन्दर्भ का ज़िक्र फिल्म पर बात करने से पहले इसलिए ज़रूरी लगा क्योंकि यह एक ‘बायोपिक’ है| किसी व्यक्ति पर बनी फिल्म में उसके जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं के प्रति ऑब्जेक्टिविटी एक शर्त होनी चाहिए बावजूद इसके इस फिल्म में मांझी की प्रेरणा का एक बेहद महत्त्वपूर्ण प्रसंग बदल दिया गया है!
जब हम सिनेमा को समझना शुरू करते हैं तो यह बात सामने आती है कि सिनेमा एक कलेक्टिव आर्ट है और अपनी स्वतन्त्रताओं के साथ इसकी कुछ सीमायें भी हैं| अपनी विशिष्टता में सिनेमा स्पेशियो-टेम्पोरल आर्ट फॉर्म है जहाँ स्थान और समय दोनों का खूबसूरत संयोजन मिलता है|
‘मांझी’ देखते हुए अनायास यह सवाल मन में आता है कि आखिर क्या कारण रहे होंगे कि निर्देशक को मांझी के जीवन में प्रेरणा का प्रसंग बदलना पड़ा| दरअसल यह प्रसंग एक ऐसा प्रस्थान बिंदु है जहाँ से फिल्म को व्यक्तिगत अथवा सामाजिक आयाम दिया जा सकता था| चूँकि हमारा हिंदी सिनेमा और हमारा समाज हीरोइज़्म को हमेशा से पोषित करता आया है, इसलिए इस प्रस्थान बिंदु को व्यक्तिगत आयाम देना न सिर्फ आसान था बल्कि फिल्म की व्यावसायिक सफलता के लिए ज़रूरी भी!
परिकथा जैसी प्रेम कहानी और नायक द्वारा कुछ ऐसा अद्वितीय कर जाना जिसकी कल्पना भी आम इन्सान न कर सके मनुष्य के मन को हमेशा से आकर्षित करती रही है| इस आकर्षण को यदि फ्रायड की कला सम्बन्धी मान्यताओं के अनुसार समझने की कोशिश करें जहाँ वह कहता है कि दमित वासनाएं जब उदात्त रूप में अभिव्यक्ति पाती हैं तो साहित्य और कला को जन्म देतीं हैं तो पाते हैं कि मनुष्य होने की सीमायें कहीं न कहीं इस आकर्षण के लिए ज़िम्मेदार हैं| ज़ाहिर है एक मनुष्य के तौर पर फिल्मकार और दर्शक (कई बार बाज़ार की अनिवार्य मांग के रूप में दर्शक और इसी कारण से फिल्मकार भी!) दोनों ही इस आकर्षण से मुक्त नहीं हैं! लिहाज़ा न सिर्फ फिल्मकार बल्कि हमारा समाज भी इस दिशा में नहीं सोचना चाहता कि जो समाज तमाम संगठित विद्रोहों और आन्दोलनों का गवाह रहा है वहाँ किसी ‘दशरथ मांझी’ की आवश्यकता क्यों पड़ती है! दशरथ मांझी की ‘सुपरहीरो’ जैसी चमकदार कहानी के पीछे के स्याह दायरे उनके चमत्कार के समक्ष कहीं धूमिल पड़ते जाते हैं…या फिर उसी हद तक सामने आते हैं जहाँ तक वे उस चमत्कार को सही साबित करने में मददगार हों| जब भी दशरथ मांझी के बारे में किसी व्यक्ति को बात करते सुना तो उनके जीवट व्यक्तित्व और उनकी करिश्माई क्षमता के आगे नतमस्तक होता पाया! बहुत कम लोग ऐसे मिले जिन्हें यह बात खटकती है कि आखिर उनके जीवन के 22साल और उनकी जी तोड़ मेहनत किसके हिस्से की थी! ज़ाहिर है उस व्यवस्था और समाज पर प्रश्नचिन्ह लगाती हुई ऐसी दृष्टियाँ कम हैं! सवाल तो यह भी है कि एक लोकतांत्रिक देश में एक अकेले व्यक्ति को यदि अपने जीवन के मूलभूत अधिकारों के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़े तो इसका दोषी कौन है!
मांझी की कहानी फिल्म विधा के लिहाज से बिल्कुल मुफीद थी सिवाय पहाड़ तोड़ने की प्रेरणा वाले प्रसंग के! लिहाज़ा चमत्कृत कर देने वाली एक बेहतरीन प्रेम कहानी बनाने के लिए उनकी बायोग्राफिकल फिल्म में भी एक अतिशय भावनात्मक एंगल डालते हुए पत्नी की मृत्यु को पहाड़ तोड़ने की प्रेरणा के रूप में लेना हर दृष्टि से बिल्कुल मुफीद रहा होगा! दर्शक की भावनात्मकता को चरम तक पहुंचाने की विशेषता को हिंदी सिनेमा पर भारतीय नाट्यशास्त्र के प्रभाव के रूप में भी देखा जाना चाहिए| मांझी के जीवन का तथ्य यह है कि थोड़े दिन तक मांझी का विरोध करने के बाद फाल्गुनी देवी भी पहाड़ तोड़ने में उनकी मदद करती रहीं और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हुई!…फिल्म के इन तमाम पक्षों/ सवालों के साथ ही यह समझना भी ज़रूरी है कि सिनेमा की अंतर्वस्तु दृश्य-श्रव्य माध्यम के द्वारा अभिव्यक्त होती है और इसे अन्फोल्ड करते हुए इस माध्यम की अवहेलना नहीं की जा सकती! अतः यह ज़रूरी हो जाता है कि फिल्म का विश्लेषण करते हुए हम इस पक्ष को भी ध्यान में रखें|
 
मांझी, केतन मेहता की चौथी बायोपिक है और डॉ. अम्बेडकर के बाद किसी दलित व्यक्ति पर बनी सम्भवतः पहली बायोपिक! आज़ादी के बाद के बिहार और गहलौर गाँव के तत्कालीन परिवेश को  कैमरा जिस खूबसूरती से क़ैद करता है वह बेहद उम्दा है| पहले दृश्य के बाद गहलौर गाँव के दो शॉट्स एक ठहराव के साथ परदे पर आते हैं…यह ठहराव यानी स्लो रिदम उस इलाके के समाज और लोगों की जिंदगियों के ठहराव को निरुपित करता है! पहाड़ के विस्तार को लॉन्ग शॉट के ज़रिये देखना एक तरफ आपकी आँखों को सुकून देता है तो दूसरी तरफ़ उस इलाके की जीवनरेखा को रोक कर खड़े उस पहाड़ के बरक्स मांझी के जीवट का परिचय भी देता चलता है|
 
फिल्म का एक दृश्य मेरे ज़ेहन में कहीं अटका रह गया है- पहला ही दृश्य, जब पहाड़ के सामने खड़े नवाजुद्दीन उसे तोड़ने की चुनौती दे रहे हैं| धरती पर बरसने को अकुलाए काले बादलों से होता हुआ कैमरा पहाड़ के समक्ष खड़े नवाजुद्दीन को पीछे से फोकस करता है और उसके बाद सामने से नवाजुद्दीन का मिड शॉट लेता हुआ उनके बेहतरीन अभिनय पर केंद्रित हो जाता है! और इसके बाद पहाड़ को पत्थर मारते मांझी और पत्थरों की टकराहट से उपजी आग! अपनी पूरी परिकल्पना और प्रस्तुतीकरण में यह दृश्य लाजवाब बन पड़ा है! इस दृश्य में निर्देशक ने जिस कुशलता से पूरी फिल्म के सार को अभिव्यंजित करने की कोशिश की है वह अपने आप में विशिष्ट है| काले बादल, पहाड़ का विराट विस्तार और चट्टानी इरादों वाला एक शख्स! …और इस शख्स के भीतर के गुस्से की व्यंजना में उसके द्वारा फेंके गए पत्थरों से पहाड़ में लगी आग! यह पूरा दृश्य निःसंदेह हिंदी सिनेमा के बेहतरीन दृश्यों से में एक होने की क्षमता रखता है|
 
फिल्म वर्तमान-फ्लैशबैक-वर्तमान के फॉर्मैट को अडाप्ट करती हुई मांझी के जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुज़रती है| यह फॉर्मैट जहाँ केतन मेहता की पिछली फिल्म ‘रंगरसिया’ की याद दिलाता है वहीँ मांझी के जीवन के तमाम प्रसंग हमारे हिंदी भाषी समाज के उस खोखलेपन को उजागर करते हैं जहाँ जाति और धर्म की दीवारें लोगों के दिलों तक में बनी हुई हैं!
 
इस फिल्म से मांझी के जीवन के जो तीन पक्ष प्रमुखता से उभरते हैं वे हैं- उनका प्रेम, उनकी जाति और जूनून की हदों को तोड़ता उनका जीवट व्यक्तित्व!
 
बचपन में ब्याही अपनी ही पत्नी फगुनिया (फाल्गुनी) से प्रेम और उसको पाने की जद्दोजहद के बीच फिल्म मांझी की शख्सियत को उसके मूल रूप में सामने लाती है| पूरी फिल्म ताजमहल जैसे प्रतीक के माध्यम से शाहजहाँ व मांझी के प्रेम के बीच लगातार संवाद स्थापित करती चलती है| फाल्गुनी के रूप में राधिका आप्टे का सौंदर्य और बेहतरीन अभिनय आपका ध्यान खींचता है| फिल्म के इस पक्ष में अखरने वाली बात सिर्फ यही लगती है कि निर्देशक ने बायोपिक होने के बावजूद तथ्य में एक बड़ा परिवर्तन करते हुए फाल्गुनी की मृत्यु को पहाड़ तोड़ने के संकल्प से जोड़ दिया है! जिसके कारणों को समझने की कोशिश लेख के शुरुआत में ही की गयी है|
 
मांझी के प्रेम पर बात करते हुए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उनके प्रेम का एक सामाजिक आयाम भी है जो निःसंदेह इस प्रेम के फलक को बहुत विस्तृत कर देता है| फिल्म में इस अयाम की कमी खलती है|
 
फिल्म में निर्देशक ने पहाड़ को एक चरित्र के रूप में अडाप्ट किया है| मानवीयता लिए हुए एक ग्रे शेड का चरित्र! जिससे मांझी नफरत का इज़हार करते हैं लेकिन समय के साथ उनकी यह नफरत उस पहाड़ से दोस्ती और फिर उसके प्रति प्रेम में बदलती जाती है| एक स्तर पर मुझे फिल्म में पहाड़ का चरित्र किसी मसाला हिंदी फिल्म के विलेन की तरह भी लगता है जिसको सही रास्ते पर लाने के क्रम में नायक के साथ उसका एक सहज रिश्ता विकसित होता जाता है|
 
मुझे याद आता है कि बचपन में जब किसी बच्चे को पत्थर या किसी अन्य चीज़ से चोट लग जाती है तो बड़े अक्सर उस पत्थर अथवा वस्तु को मारकर बच्चे के तकलीफ़ को कम करने की कोशिश करते हैं…ज़ाहिर है यह बेहद इन्नोसेंस के साथ की गयी एक जुगत होती है बच्चे को बहलाने-फुसलाने की! उसी सामाजिक मानस से आने वाले मांझी बड़ों की दुनिया में पहाड़ से लगी एक चोट को उतने ही सेंसिटिव तरीके से लेते हैं! एक नया रास्ता निकालते हैं सोचने और समझने का…आप  इस रास्ते से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी लगन और प्रतिबद्धता के क़ायल हुए बगैर नहीं रह सकते!
 
फिल्म का दूसरा पक्ष तत्कालीन जाति व्यवस्था और मांझी के जीवन पर उसके प्रभाव को दिखाने से जुड़ा है| जिस तरीके से 1956 के अस्पृश्यता उन्मूलन क़ानून को 7साल बाद अपने घर लौट रहे युवा मांझी और उनकी पत्नी फगुनिया को इंट्रोड्यूस करने के प्रसंग से जोड़ा गया है वह उल्लेखनीय है| बाज़ार के इस दृश्य में अस्पृश्यों का एक जुलूस ‘जात-पात का चक्कर छूटा, सब बराबर!’ के नारे के साथ अस्पृश्यता उन्मूलन का जश्न मना रहा है…नाच रहा है…वहीँ दूसरी तरफ गाँव के रसूखदार ऊँची जाति के लोग उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से रोकने के लिए लाठी-डंडे सहित इस जुलूस का इंतज़ार कर रहे हैं| इस दृश्य के तनाव को अचानक ही कुछ नाटकीय परिवर्तनों के द्वारा निर्देशक  हास्य में तब्दील कर देता है| यह तनाव इस हास्य में घुलता नहीं है…बस थोड़े समय के लिए गुम हो जाता है|
 
सब बराबर! और सबको छू सकते हैं! की खुशी और शहर से लौटने का सोफेस्टीकेशन लिए नवाजुद्दीन 7 साल बाद गाँव वापस लौट रहे हैं और बैकग्राउंड में ‘श्री 420 के ‘मेरा जूता है जापानी’ गीत के मुखड़े और अंतरे के बीच का साउंड ट्रैक बज रहा है| अपने प्रभाव में यह दृश्य दो तरह का अर्थ  अभिव्यंजित कर रहा है- पहला अर्थ उस खुशी से सम्बंधित है जो सात साल तक धनबाद के कोल माईन में काम कर पैसा कमा कर लौटे एक दलित व्यक्ति के चेहरे के उत्साह, उसके काले चश्मे, पीली व लाल शर्ट और पैंट में दिख रहा है…दूसरा अर्थ एक फिल्म विशेष (श्री 420) के बैकग्राउंड म्युज़िक के द्वारा धोखाधड़ी (IPC 420) का भाव अभिव्यंजित करता हुआ व्यवस्था द्वारा दलितों के साथ किये गए धोखे से जुड़ता है!  इस पूरे सीक्वेंस में मुखिया की इस नये क़ानून के प्रति नाखुशी और उसके लठैतों का ये कथन कि क़ानून बघारने से क्या होता है…इसे लागू कौन कराएगा! और इसके तुरंत बाद मुखिया को छूने के जुर्म में मांझी की बेतरह पिटाई! वह तनाव जो हास्य में घुला नहीं था यहाँ आकर फूट तो पड़ता है लेकिन न कोई विरोध पैदा करता है न ही प्रतिकार…गांव में घुसने से पहले (और अश्पृश्यता उन्मूलन क़ानून बन जाने के बाद भी) सूत्रधार की यह घोषणा कि कुछ नहीं बदला है गहलौर में सब वैसा का वैसा ही है भी शायद इसी तरफ इशारा करता है| ज़ाहिर है अस्पृश्यता उन्मूलन क़ानून का व्यवहारिक सच इस सीक्वेंस से स्पष्ट हो जाता है|
 
दरअसल आज भी हिंदी पट्टी के हमारे समाज की मानसिकता सदियों पुरानी उन्हीं मान्यताओं को पोषित कर रही है| आज भी जाति हमारे समाज का सच है! फिल्म, इस जातिवादी व्यवस्था द्वारा शोषित और हथियारों से क्रान्ति व परिवर्तन के रास्ते पर निकल पड़े मांझी के दोस्त झुमरू के मार्फ़त नक्सलवादी आंदोलन के रूप में इस समाज के एक बड़े सच को सतही तौर पर छूते हुए निकल जाती है और मांझी के स्टैंड द्वारा सीधे तौर पर झुमरू के विरोध में ही खड़ी नज़र आती है|
यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसका वर्तमान अभी भी बासी नहीं हुआ है| इसलिए नज़र बार-बार दशरथ मांझी के समय और उनके परिवेश की ओर मुड़ जाती है| मांझी के जीवनकाल में ही उस इलाके में ‘रणवीर सेना’ जैसी ताकतों का उदय और ‘लक्ष्मणपुर बाथे’ जैसे न जाने कितने  भयावह दलित हत्या कांड भी हो चुके हैं बावजूद इसके फिल्म मांझी के पूरे जीवन को न दिखाते हुए उनके द्वारा पहाड़ तोड़ लेने को कथा के चरम के रूप में अडाप्ट है| फिल्म को ‘सुखान्त’ रखने की अनिवार्यता भी इसका कारण हो सकती है| कारण जो भी हो लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में फिल्म जाति के मसले पर ऐसे कई ऐतिहासिक सन्दर्भों से खुद को काट लेती है|
 
मांझी का व्यक्तित्व उनके चट्टानी इरादे की वजह से जाना जाता है| फिल्म भी उनके इसी पक्ष को ग्लोरिफाई करती है| लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन्सान होने की सीमाएं उसके अटल इरादों का रास्ता रोकने में कोई कसर नहीं छोड़तीं| लिहाज़ा मांझी भी टूटते हैं…निराश होते हैं…लेकिन अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ते| फिल्म में मांझी के भीतर के इन्सान की द्वंद्वात्मकता को संप्रेषित करता एक दृश्य है जब मांझी से मिलने के लिए पत्रकार दूसरी बार उनके पास आता है| …इस दृश्य में मांझी पहली बार यह स्वीकार करते दिखते हैं कि वे एक बेहद मुश्किल काम कर रहे हैं…पत्रकार द्वारा अपना अखबार निकालने को मुश्किल बताने वाले संवाद के बाद मांझी का यह कथन कि अपना अखबार निकालना क्या पहाड़ तोड़ने से भी मुश्किल है और एक जोरदार अट्टहास! यह अट्टहास न सिर्फ उनकी अपनी तकलीफ़ बयां करता है बल्कि व्यवस्था को आईना भी दिखाता है! इसी दृश्य में पत्रकार के चले जाने के तुरंत बाद उसका लाया केला खाते नवाजुद्दीन, मांझी के उस इंसानी रूप को सामने लेकर आते हैं जो समाज में उनकी हीरोइक छवि के पीछे कहीं छुपा रह गया है! एक इन्सान जिसकी भूख अपने चरम पर है लेकिन वह इसे नुमांया नहीं कर सकता|       
यह फिल्म मांझी के रूप में नवाजुद्दीन की फिल्म है| उनकी शख्सियत के उन पहलुओं को जिनकी वजह से मांझी, मांझी बने…नवाजुद्दीन ने अपने शानदार अभिनय से साकार किया है| राधिका आप्टे और तिग्मांशु धूलिया अपने किरदारों में घुले दिखते हैं तो झुमरू के किरदार में प्रशांत नारायणन अपने बेहतरीन अभिनय से ध्यान खींचते हैं| फिल्म के डायलॉग रिलीज़ से पहले ही लोकप्रिय हो चुके थे| फिल्म के संगीत में लोक का प्रभाव स्पष्तः देखा जा सकता है| फिल्म के परिवेश की भाषा में जिस क्षेत्रीय पुट की कमी महसूस होती है उसके लिए निर्देशक फिल्म के प्रारम्भ में ही स्पष्टीकरण दे देता है! ध्वनि और प्रकाश के बेहतरीन सामंजस्य और कैमरे के खूबसूरत संचालन ने पूरी फिल्म की लय को बरकरार रखा है| इस तरह से कह सकते हैं कि अपने तमाम मजबूत पक्षों के साथ ‘मांझी’ एक बेहतरीन फिल्म है लेकिन एक ‘बायोपिक’ के तौर पर अपनी कमजोरियों के साथ यह दर्शक के मन में कुछ सवाल छोड़ जाती है…जिनके जवाब बाज़ार और व्यावसायिकता के साथ ही साथ कलागत मजबूरियों और एक विशेष राजनैतिक चेतना के तकाज़े से ढूंढें जाने चाहिए|           

                     
           
        
  

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