हाल में युवा लेखक शहादत और अक्षत जैन ने जानी-मानी सामाज शास्त्री और इतिहासकार मीरा नंदा की किताब A Field Guide to Post-truth India का हिंदी अनुवाद किया है। यह किताब हिंदी में आस पब्लिशर्स से ‘सत्य विपरीत भारत: विनाशकाल की नियमावली’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। आज उसका एक अंश पढ़िए- मॉडरेटर
=============
पोस्ट–ट्रुथ क्या है?
“पोस्ट-ट्रुथ” शब्द को ऑक्सफ़र्ड डिक्शनरी ने 2016 में ‘वर्ड ऑफ़ द ईयर’ घोषित किया था। इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई थी: “ऐसे हालात जिनमें भावनात्मक अपीलें सार्वजनिक राय को आकार देने में वस्तुनिष्ठ तथ्य से ज़्यादा प्रभावशाली होती हैं।”[1]
जैसा कि ऑक्सफ़र्ड डिक्शनरी स्पष्ट करती है, “पोस्ट-ट्रुथ” में “पोस्ट” का अर्थ यह नहीं है कि यह “सत्य के बाद का समय” है। अर्थात् ऐसा समय, जब सत्य की धारणा पूरी तरह मर चुकी हो और पीछे छूट चुकी हो। अगर “सत्य” की कोई धारणा ही न बचे तो हमें यह कैसे पता चलेगा कि हम पोस्ट-ट्रुथ दौर में हैं? अगर सत्य का विचार ही ग़ायब हो जाए, तो हम झूठ, आधे-सच, चौथाई-सच, या खालिस बकवास को पहचानेंगे कैसे?
यानी पोस्ट-ट्रुथ का अस्तित्व भी इस बात पर निर्भर करता है कि कहीं-न-कहीं सत्य का विचार अब भी बना हुआ है। हालांकि उसे लगातार दबाया, झुकाया और अपदस्थ किया जा रहा है।
पोस्ट-ट्रुथ स्थिति में सत्य अब भी मौजूद होता है और झूठ अब भी झूठ ही रहता है। दो और दो अब भी चार होते हैं; ट्रंप वास्तव में 2020 का राष्ट्रपति चुनाव हार गया था। वहीं भारतीय संविधान आज भी धर्म के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी को समान अधिकार देने का वादा करता है। हालांकि, पोस्ट-ट्रुथ दुनिया में सार्वजनिक विमर्श में वस्तुनिष्ठ और प्रमाणित तथ्यों का महत्त्व खोता चला जाता है। लोग झूठ सुनने और छद्म-विज्ञान परोसे जाने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे धीरे-धीरे वह क्षमता ही खो बैठते हैं, जिसे एलन सोकल ने इन शब्दों में बताया है: “चीज़ों को उनके नाम से पुकारने की क्षमता— दूध को दूध, पानी को पानी, झूठ को झूठ और धोखाधड़ी को धोखाधड़ी कहने की ताक़त” (Sokal 2018, 47)।
तीन ऐसी प्रमुख प्रक्रियाएं हैं, जो राजनीति, लोकनीति और सामाजिक जीवन में सत्य को एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में निष्प्रभावी बना देती हैं।
पहली बात यह है कि जैसे जलकुंभी किसी तालाब को धीरे-धीरे घेर लेती है, वैसे ही “बकवास” (Bullshit) उस समाज पर क़ब्ज़ा कर लेती है, जो पोस्ट-ट्रुथ अवस्था की ओर फिसल रहा होता है। पोस्ट-ट्रुथ संस्कृति असल में बकवास की संस्कृति है— जैसा अमेरिकी दार्शनिक हैरी फ्रैंकफर्ट ने अपनी 2005 की चर्चित पुस्तक ‘ऑन बुलशिट’ में बड़ी तीक्ष्णता से बताया है। फ्रैंकफर्ट का तर्क है कि बकवास झूठ से इस मायने में अलग होता है कि झूठ बोलने वाला जानता है कि वह जो कह रहा है, वह सच नहीं है। वहीं, बकवास करने वाला इस बात की कोई परवाह ही नहीं करता कि जो वह कह रहा है, वह सच है या झूठ— जब तक कि उसे अपना काम निकलता दिखे। उनके शब्दों में: “सत्य के प्रति यह पूर्ण उदासीनत— चीज़ें वास्तव में जैसी हैं, उसकी कोई परवाह न करना— यही बकवास की आत्मा है।” (पृष्ठ 14) झूठा व्यक्ति सत्य को जानता है, लेकिन उसे छुपाता है, जबकि बकवास करने वाला सत्य-विवेक से ही विरक्त होता है। इसी कारण फ्रैंकफर्ट का मानना है, “झूठ की तुलना में बकवास सत्य की ज़्यादा बड़ी दुश्मन है।”[2]
बकवास करने की कला में ट्रंप का कोई सानी नहीं है। वह व्यक्ति बिना झिझक और आदतन ऐसी बातें कर सकता है, जो कैमरे में रिकॉर्ड हुई घटनाओं से भी सीधा विरोध करती हैं।[3] पोस्ट-ट्रुथ अमेरिका का असली संकट यह नहीं है कि ट्रंप ने बकवास की, बल्कि यह है कि उसकी बकवास ने इतने लोगों को प्रभावित किया कि वह व्हाइट हाउस तक पहुंच गया।
भारत में भी बकवास की कोई कमी नहीं है। लेकिन यहां यह अक्सर छद्म-विज्ञान के रूप में सामने आती है, जिसे कभी देश के शीर्ष “विशेषज्ञों” द्वारा और कभी रोज़मर्रा के झोलाछाप “ज्ञानियों” द्वारा पेश किया जाता है। कहा जा सकता है कि भारत में छद्म-विज्ञान बकवास की सबसे पसंदीदा शैली बन चुकी है, जिसमें गूढ़ प्रतीत होने वाले दावे किए जाते हैं, जो “विज्ञान” के नाम पर होते हैं। हालांकि, उनका कोई स्पष्ट, परख-योग्य या प्रमाणिक आधार नहीं होता। छद्म-विज्ञान बकवास के ही कुनबे से आता है, क्योंकि उसकी तरह यह भी ज्ञानात्मक शोर पैदा करता है। ऐसा शोर, जो ख़ुद को वैज्ञानिक प्रमाणों से समर्थित बताता है, लेकिन वास्तव में न तो वैज्ञानिक पद्धति की परवाह करता है और न ही स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों की। बकवास और छद्म-विज्ञान दोनों सीधे झूठ से ज़्यादा ख़तरनाक हैं, क्योंकि “झूठ तो वास्तविकता के बारे में सीधे दावे होते हैं, जिन्हें पर्याप्त जांच-पड़ताल से झूठ साबित किया जा सकता है, जबकि बकवास और छद्म-विज्ञान बच निकलते हैं, क्योंकि वे कभी स्पष्ट दावे करते ही नहीं” (Ladyman 2013, 53)। जहां अमेरिका में ट्रंप शैली की सीधी-सादी बकवास ने बड़े झूठों को पनपने की ज़मीन दी, वहीं भारत में छद्म-विज्ञान का फैलाव, जैसा कि हम आगे देखेंगे, गहरे झूठों को खाद-पानी दे रहा है।
पोस्ट-ट्रुथ संस्कृति में दूसरी अहम बात यह होती है कि सत्य की बात तो जारी रहती है, लेकिन सत्य को भीतर से खोखला कर दिया जाता है। “सत्यमेव जयते” का नारा अब भी दोहराया जाता है। मगर जिस प्रमाण और तथ्यात्मकता पर वह सत्य आधारित होता था, उसकी परिभाषा ही पूरी तरह बदल दी जाती है। सत्य के पक्ष में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणों की परख और उनकी जांच-पड़ताल की वैज्ञानिक परंपरा की जगह अब तथाकथित “वैकल्पिक तथ्यों” ने ले ली है। भारत में यह स्थान ऐसी बनावटी कहानियों ने ले लिया है, जिनके लिए “प्रमाण” भी उसी विश्वास के जाल से गढ़ लिए जाते हैं, जिसमें मिथक और तथ्य के बीच कोई भेद नहीं होता। साथ ही उस अंतर को भी नहीं समझा जाता है, जो साधारण मनुष्यों के अनुभव से प्राप्त ज्ञान और आध्यात्मिक रूप से “दृष्टा” ऋषियों द्वारा कथित रूप से प्राप्त ज्ञान के बीच होता है, जिसे धार्मिक ग्रंथों में दर्ज कर दिया गया है। यानी सत्य की भाषा तो बनी रहती है, लेकिन उसमें सत्य का मर्म ही मिटा दिया जाता है।
सत्य को कैसे खोखला किया जाता है, इसका एक बेहद सटीक उदाहरण डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकील रूडी जूलियानी ने पेश किया। उन्होंने राष्ट्रीय टेलीविज़न पर कहा: “सत्य, सत्य नहीं होता,” बल्कि किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण होता है। उन्होंने आगे जोड़ा, “तथ्य, तथ्य नहीं होते,” बल्कि वे केवल देखने वाले की नज़र में तथ्य जैसे प्रतीत होते हैं।[4] इस दर्शन के तहत सत्य वास्तविक दुनिया का वस्तुनिष्ठ विवरण नहीं रह जाता, बल्कि किसी की व्यक्तिगत व्याख्या रह जाता है। प्रमाणों का ज़िक्र अब भी किया जाता है; हालांकि, अब उन्हें ऐसे स्वतंत्र रूप से जांचे-परखे जा सकने वाले तथ्य के रूप में नहीं देखा जाता, जिनमें विरोधाभास दूर किया जा सके; बल्कि अब वे प्रमाण केवल किसी के निजी या राजनीतिक दृष्टिकोण से निकाले गए “तथ्य” बन जाते हैं। इस तरह सत्य की जगह निजी राय की दृढ़ता ले लेती है। साथ ही प्रमाण की जगह आस्था, पक्षपात और विचारधारा ले लेते हैं।
तीसरी बात यह होती है कि इंटरनेट के ज़रिए फैलने वाली ग़लत सूचनाओं, फ़र्ज़ी ख़बरों और साज़िशी कहानियों का विस्फोट सार्वजनिक क्षेत्र को बकवास से पूरी तरह भर देता है। चाहे वह सीधी-सादी बकवास हो या छद्म-विज्ञान के आवरण में लिपटी हुई। ऐसे स्वार्थपरक ‘तथ्य,’ जो प्रमाणों से पूरी तरह बेपरवाह होते हैं, राष्ट्रवादी एजेंडे और धार्मिक जुनून से उपजी जन-भावनाओं की सेवा में झोंक दिए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में तथ्यों की ज़रूरत नहीं रह जाती। केवल भावनात्मक सहमति और विचारधारात्मक जुनून काफी होता है। यही वह ज़मीन है, जहां पोस्ट-ट्रुथ राजनीति अपने सबसे घातक रूप में फलती-फूलती है।
पोस्ट-ट्रुथ वह अवस्था है, जहां भावनाओं की तात्कालिकता तर्क की सूझबूझ पर विजय पा लेती है। यह उस क्षण को दर्शाता है, जब मन का विचारशील हिस्सा “अंतरात्मा की आवाज़” द्वारा क़ब्ज़े में ले लिया जाता है।
सत्य इतना हाशिए पर कैसे चला गया? लोग इस हद तक उदासीन कैसे हो गए कि उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वे जो मानते हैं, उसका तथ्यात्मक आधार है या नहीं? इस सत्य-संकट की कई परतें हैं। हालांकि, विडंबना यह है कि इस हमले की अगुवाई स्वयं बौद्धिकों ने की। वे बौद्धिक, जो सोशल कंस्ट्रक्टिविज़्म, पोस्ट-कोलोनियलिज़्म और ज्ञान को सत्ता का खेल मानने वाले अन्य फैशनेबल सिद्धांतों के झंडे तले खड़े हुए। इन सिद्धांतों का तर्क यह रहा है कि जिसे हम वैज्ञानिक तथ्य मानते हैं, वह इसलिए तथ्य नहीं बन जाता क्योंकि वह दुनिया की किसी स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ सच्चाई को पकड़ता है।[5] बल्कि, तथ्यों का निर्माण उन लोगों के सामाजिक हितों, पहचानों और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर होता है, जो ज्ञान का उत्पादन करते हैं। इस दृष्टिकोण में सत्य अब कोई सार्वभौमिक वस्तु नहीं है, जिसे सभी देख और जांच सकते हैं। इसके बजाय, यह कहा गया कि हम कभी भी “वास्तविक दुनिया” तक नहीं पहुंच सकते। हम सिर्फ़ यह कह सकते हैं: मेरी सच्चाई, तुम्हारी सच्चाई, हमारे समुदाय की सच्चाई। इनके हिसाब से कभी भी एक वस्तुनिष्ठ सच्चाई नहीं रही, क्योंकि ऐसा कुछ अस्तित्व में ही नहीं है।
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि अकेले शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने मौजूदा सत्य-संकट को जन्म दिया है। ऐसा कहना उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा शक्ति सौंपना होगा। फ़िर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वस्तुनिष्ठ ज्ञान की संभावना के प्रति उनके संदेह ने इस संकट को बढ़ावा ज़रूर दिया। तथ्यों को ‘सामाजिक समझौतों’ का नतीजा मानने वाला शैक्षणिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक तर्क को ‘मानसिक उपनिवेशवाद’ कहकर खारिज करने वाली बौद्धिकता अब विश्वविद्यालयों की दीवारों तक सीमित नहीं रही। जो कभी शोध-पत्रिकाओं में होने वाली कठिन दार्शनिक बहसों का विषय था, वह अब कांस्पीरेसी थ्योरी फैलाने वालों, ‘डिकॉलोनाइज़ेशन’ के योद्धाओं और हर तरह के लोकलुभावन हमलावरों के लिए आम औजार बन चुका है। इन सबका निशाना ज्ञान-उत्पन्न करने वाली ‘एलीट’ जमात है, जिसमें वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और शिक्षाविद शामिल हैं। भारत में इस ‘एलीट’ को मोदी की परिभाषा में ‘खान मार्केट गैंग’ कहा गया है। साथ ही इन पर ‘धर्मनिरपेक्ष,’ ‘मानसिक रूप से उपनिवेशित’ और अंग्रेज़ी-भाषी होने का अतिरिक्त ठप्पा भी लगाया जाता है।[6] वस्तुनिष्ठ ज्ञान के प्रति जो शैक्षणिक संदेह था, वह अब ‘लोकतांत्रिक’ हो गया है, यानी आम धारणाओं और जनमत का हिस्सा बन गया है। यह बदलाव कुछ सिद्धांत-प्रेमियों के लिए उत्सव का कारण है, जबकि वही पुराने पुरोहितगण, जो कभी इन संदेहों के प्रवर्तक थे, आज इससे हतप्रभ हैं।[7]
‘इंडिक’ ज्ञान परंपराओं की ओर बढ़ते वैचारिक परिवर्तन का विश्लेषण करने से पहले यह स्पष्ट करना उपयोगी होगा कि भारत की पोस्ट-ट्रुथ स्थिति उस आम किस्म की पोस्ट-ट्रुथ बीमारी से किस तरह भिन्न है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों में महामारी बन चुकी है।
पोस्ट-ट्रुथ के दो रास्ते
पोस्ट-ट्रुथ युग में सत्य को खोखला और अप्रासंगिक बनाने के दो मुख्य रास्ते हैं।
पहला रास्ता खुलकर, बेहिचक झूठ बोलना है, जो जानबूझकर तथ्यों की अनदेखी करता है, या फ़िर ऐसी सीधी-सादी बकवास करना, जिसे शुरुआत से ही तथ्यों से कोई सरोकार नहीं होता। सत्य को विकृत करने का यह तरीक़ा सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में बहुत आम हो गया है, जहां लगभग कुछ भी “तथ्य” के रूप में परोसा जा सकता है। झूठ और बकवास लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर देते हैं, क्योंकि लोकतंत्र तभी चल सकता है, जब नागरिक पर्याप्त जानकारी रखते हों और जिस दुनिया में वे रहते हैं, उसके बुनियादी तथ्यों पर किसी हद तक सहमति हो।
हालांकि झूठ और बकवास लोकतंत्र के लिए घातक हैं, फ़िर भी उन्हें तर्क और प्रमाण की मानक प्रक्रियाओं के ज़रिए उजागर करना अपेक्षाकृत आसान होता है। झूठ और बकवास को पहचानना और उन्हें सार्वजनिक रूप से चुनौती देना मुश्किल नहीं है। हालांकि, एक बार जब बकवास की संस्कृति समाज में गहराई से जड़ें जमा लेती है, तब इन्हें हटाना बेहद कठिन हो जाता है। आप चाहे जितनी बार तथ्यों की जांच करें, लेकिन जब न तो बकवास करने वाले को और न ही जनता को सच या तथ्यों की परवाह हो, तब किसी भी तथ्य-जांच का कोई असर नहीं रह जाता। आइए, पोस्ट-ट्रुथ की इस किस्म को— जो भले ही हद दर्जे तक बेहूदगी से भरी हो, लेकिन सिद्धांततः फैक्ट-चेकिंग के दायरे में आती है— “बड़ा झूठ” कहें।
पोस्ट-ट्रुथ की दूसरी किस्म धार्मिक कट्टरता के अधिक निकट है, जो तथ्यात्मक सत्य और धार्मिक मत के बीच; अनुभवजन्य प्रमाण से समर्थित सत्य और ईश्वर या सिद्ध पूर्वजों द्वारा प्रकट ‘परम सत्य’ के बीच; और इतिहास व मिथक के बीच हर भेद को मिटा देती है। यह किस्म बड़े झूठ से अलग है, क्योंकि इसमें सत्य और तर्क को सार्वभौमिक नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें संस्कृति और धर्म की पृष्ठभूमि पर आधारित सापेक्ष मान्यताएं बना दिया जाता है।
पोस्ट-ट्रुथ की यह किस्म एक ऊंचे दर्जे की बकवास के रूप में व्यक्त होती है, जिसे हम एथ्नो-साइंस या नस्लीय विज्ञान कह सकते हैं। यह उस तरह का ‘तथ्यात्मक ज्ञान’ है, जो किसी विशेष सांस्कृतिक या धार्मिक विश्वदृष्टि में निहित विचारश्रेणियों और प्रमाण के अपने नियमों के आधार पर प्राप्त होता है। एथ्नो-साइंस हर तरह के छद्म-विज्ञान के लिए रास्ता खोल देती है, क्योंकि इसका दावा है कि यह दुनिया की वैसी ही व्याख्या प्रस्तुत करती है, जैसी कि सामान्य विज्ञान करता है। हालांकि, फ़र्क़ यह होता है कि यहां ‘विज्ञान’ की अवधारणा अनुभवजन्य दुनिया से नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक मूल्यों से संचालित होती है।[8] उदाहरण के लिए, “भारतीय ज्ञान परंपराओं” की जो तत्वमीमांसा और कार्यपद्धति है, वह न सिर्फ़ इन नकली “विज्ञानों” की विषय-वस्तु को वैध ठहराती है, बल्कि आलोचकों को चुप कराने का भी ज़रिया बनती है, क्योंकि विरोध करने वालों को आसानी से “पश्चिमीकरण से प्रभावित अभिजात वर्ग” कहकर ख़ारिज कर दिया जाता है।
एथ्नो-साइंस और उससे उपजे छद्म-विज्ञान को खंडित करना कहीं अधिक कठिन होता है, क्योंकि ये तथ्य और तर्क की स्वीकृत धर्मनिरपेक्ष-तार्किक पद्धतियों को मानने से इंकार करते हैं। इसके बजाय वे इन पद्धतियों को “साइंटिज़्म” कहकर नकारते हैं। उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भों में इन्हें “यूरो-सेंट्रिक” (पश्चिम-केंद्रित) कहकर ख़ारिज कर देते हैं। आइए हम पोस्ट-ट्रुथ की इस दूसरी किस्म को, जो बड़े झूठ जितनी ही घातक हो सकती है, लेकिन सिद्धांततः खंडन-रोधी रहती है, “गहरा झूठ” कहें।
बड़ा झूठ एक सीधा-सपाट छल है, जबकि गहरा झूठ कहीं अधिक जटिल और गहन छल है। दोनों ही वस्तुनिष्ठ सत्य के आदर्श का मज़ाक उड़ाते हैं और उसे भीतर से खोखला करते हैं। दोनों सत्य की खोज की भावना को नकारते हैं। हालांकि, इन दोनों की प्रेरणाएं और काम करने के तरीके अलग-अलग होते हैं। ये दोनों प्रकार की पोस्ट-ट्रुथ प्रवृत्तियां दुनिया भर में सक्रिय हैं। हालांकि, अलग-अलग देशों और संदर्भों में इनकी तीव्रता और रूप भिन्न होते हैं।
[1] https://languages.oup.com/word-of-the-year/2016/
[2] फ्रैंकफर्ट का पूरा उद्धरण इस प्रकार है: “जो व्यक्ति झूठ बोलता है और जो सच बोलता है, वे एक ही खेल में विपरीत पक्षकारों की भूमिका निभा रहे होते हैं। दोनों तथ्यों के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं, उसी अनुरूप जैसा वे उन्हें समझते हैं। हालांकि एक की प्रतिक्रिया सत्य की प्रामाणिकता से निर्देशित होती है, जबकि दूसरे की प्रतिक्रिया उस प्रामाणिकता को ठुकरा देती है और उसकी अपेक्षाओं को मानने से इंकार करती है। बकवास करने वाला इन अपेक्षाओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है। वह सत्य की प्रामाणिकता को झूठे की तरह खारिज नहीं करता, न ही उसका विरोध करता है। बल्कि वह सत्य की ओर कोई ध्यान ही नहीं देता। इसी कारण बकवास सत्य की झूठ से भी बड़ी शत्रु है।” (पृष्ठ 22)
[3] जैसा कि जेम्स बॉल ने अपनी 2017 की किताब ‘पोस्ट-ट्रुथ: हाउ बुलशिट कॉन्कर्ड द वर्ल्ड’ में लिखा है: “ट्रंप बिना किसी असहजता के उन घटनाओं के बारे में भी झूठ बोल सकता है, जो वीडियो में रिकॉर्ड हैं: चुनाव प्रचार के दौरान जब उसने न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर सर्ज कोवालेस्की की शारीरिक अक्षमता की नकल की थी, जो एक टीवी रैली के मंच पर सबके सामने हुई घटना थी, तो ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं, या फ़िर यह कि वह उस रिपोर्टर से कभी मिला ही नहीं (जबकि वह उससे कई बार मिल चुका था)।” (पृष्ठ 11)
[4] गिलियानी: “Truth isn’t truth,” Politico, 19 अगस्त 2018। उपलब्ध: https://www.politico.com/story/2018/08/19/giuliani-truth-toddtrump-788161
[5] मेरी आगामी पुस्तक ‘द वेजस ऑफ़ अनरीज़न: पोस्ट-कॉलोनियल थियोरी एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू नेशनालिज़्म’ में मैंने पोस्ट-कॉलोनियल वामपंथ और हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ दोनों द्वारा धर्मनिरपेक्ष आधुनिकता और उसकी तार्किकता की मूल मान्यताओं पर किए गए हमले की विस्तृत आलोचना प्रस्तुत की है।
[6] देखें: Mayank Bharadwaj “‘Khan Market Gang’: Modi mocks his elite adversaries,” Reuters, 31 मई 2019 उपलब्ध: https://www.reuters.com/article/idUSKCN1T10KL/
[7] विज्ञान अध्ययन (साइंस स्टडीज़) का अनुशासन, जो दशकों तक वस्तुनिष्ठ सत्य और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के विचार के ख़िलाफ़ अगुवा रहा है, आज स्वयं संकट में है, क्योंकि अब विशेषज्ञ ज्ञान के प्रति अविश्वास सामान्य सामाजिक मुद्रा बन चुका है। यह अविश्वास अब सोशल मीडिया पर फर्ज़ी कोविड इलाज बेचने वालों, जलवायु परिवर्तन से इंकार करने वालों, चुनावी नतीजों को नकारने वालों, एंटी-वैक्सर्स और हर रंग की षड्यंत्र-थ्योरी गढ़ने वाली फौज के बीच खुलेआम प्रचलित हो चुका है। इस स्थिति में साइंस स्टडीज़ के कुछ संस्थापक चिंतकों ने ख़ुद अपनी पहले की धारणाओं से पल्ला झाड़ लिया है। ख़ासकर हैरी कॉलिन्स (2017) और ब्रूनो लातूर (2004) ने अब यह स्वीकार किया है कि ज्ञान के हर दावे को विज्ञान के समकक्ष रखकर सत्य और असत्य के बीच कोई भेद न करना एक ख़तरनाक ग़लती थी। वहीं दूसरी ओर, स्टीवन फुलर जैसे सच्चे निष्ठावान विचारक पोस्ट-ट्रुथ को सोशल कंस्ट्रक्टिविज़्म की स्वायत्त पुष्टि मानते हैं। देखें: “Embrace the Inner Fox: Post-Truth as the STS Symmetry Principle Universalized”
https://social-epistemology.com/2016/12/25/embrace-the-inner-fox-posttruth-as-the-sts-symmetry-principle-universalized-steve-fuller/ विज्ञान अध्ययन के लिए “पोस्ट-ट्रुथ का क्षण” क्या अर्थ रखता है — इस पर विश्लेषण के लिए देखें: Johan Soderberg (2022)।
[8] माइकल रूज़ विज्ञान दर्शन के प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान हैं और क्रिएशनिज़्म (सृष्टिवाद) के आलोचक भी हैं। वह छद्म-विज्ञान की एक परिभाषा देते हैं, जो इसे एथ्नो-साइंस से जुड़ा हुआ दिखाती है: “…छद्म-विज्ञान एक ऐसा ज्ञान-संग्रह या दावों का समूह है, जो स्वयं को ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करता है। यह भौतिक जगत के बारे में उसी अर्थ में ज्ञान या कथित ज्ञान होता है, जैसा सामान्य विज्ञान में होता है। हालांकि, यह अनुभवजन्य दुनिया के बजाय सांस्कृतिक मूल्यों— धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिक आदि से संचालित होता है। हालांकि, इसके दावे जब भौतिक जगत से टकराते हैं तो पीछे हटने की ज़िम्मेदारी भौतिक जगत की होती है, न कि उन दावों की।” (Ruse 2018, पृष्ठ 304)

