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दिव्या विजय की कहानी ‘परवर्ट’

मेरे जीमेल अकाउंट में अनजान पतों से अच्छी अच्छी कविताएं ही नहीं कई बार सुन्दर कहानियां भी आती हैं. आज दिव्या विजय की कहानी. दिव्या बायोटेक्नोलोजी से स्नातक हैं, मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बाद बैंकॉक में रहती हैं. उनकी यह कहानी अच्छी है या बुरी यह तो आप पढ़कर बताएँगे. लेकिन बहुत सधी हुई भाषा, संतुलित शैली निश्चित रूप से प्रभावित करती है. पढियेगा- मॉडरेटर 
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उसने नीचे झाँक कर देखा। कुछ बच्चे स्टेडियम में क्रिकेट खेल रहे थे। चिल्ड बीयर का एक घूँट गले से नीचे उतारा। ठण्ड थी कि धूप में बैठा जा सके मगर इतनी भी नहीं कि ठंडी बीयर न पी जा सके। वैसे वो हर मौसम में इसे पी सकता था। 


शहर में रूफटॉप रेस्टोरेंट्स का चलन नया नया ही शुरू हुआ था। और खूब ज़ोरों पर था।किसी इमारत की छत पर उग आये ये रेस्टोरेंट्स गति, रोमांच और खूबसूरती सब समेटे हुए थे। हर तरीके के पेय पदार्थ और नए तरीके का फ़ास्ट फ़ूड नुमा भोजन। तेज़ विदेशी संगीत।लहराते परदे वहाँ के माहौल को कमसिन बना रहे थे।  छत के नाम पर झोंपड़ी के ऊपर डाला जाने वाला छप्पर।गरीब लोग जिसे सर ढकने के लिए प्रयोग में लाते हैं वो यहाँ कंटेम्पररी के नाम पर फैशन बना हुआ था। वैसे वो लाजवाब लग रहा था। वहाँ टंगे हुए फानूस दिन में भी जल रहे थे और फिजाँ को रूमानीपन दे रहे थे। 



देसी विदेशी जोड़े एक दूसरे से सट कर वहाँ बैठे थे। एक दूसरे के कानों में कुछ फुसफुसाते हुए। एक दूसरे के मोबाइल्स में झाँकते हुए। बालों को लहराती घुटनों से ऊपर की पोशाकें पहने तन्वंगियाँ और महँगी कारों की चाबियाँ अँगुलियों में घुमाते नौजवान। कितने खुश थे वे सब। बात बेबात खिलखिला रहे थे। क्या वो वाकई खुश थे या ऐसी जगहों पर खुश दिखना ज़रूरत हो जाती है। उसने चारों तरफ नज़रें घुमाई। वही था जो अकेला था। शायद वो गलत जगह पर आ गया था। चलते चलते उसका गला सूखने लगा था और अचानक ही उसे कुछ पीने की तलब हो आई थी। सामने बड़ा सा बोर्ड दिखा। वो लिफ्ट से होते हुए ऊपर आया था। जगह उसे खूबसूरत लगी थी और उत्तेजक भी। उसने सामने वाले आईने में अपना अक्स दिखा। आँखों के नीचे हलके काले घेरे और लटकी हुई त्वचा के साथ अपना चेहरा उसे बेजान लगा। उसे लगा वो भालू जैसा दिख रहा है। उसने मुस्कुराने की कोशिश की पर अकेले आदमी का खुश दिखना कोई ज़रूरी नहीं। सोच कर फ़िर अपने खोल में घुस गया। पर वो ग़मगीन भी नहीं था। वो तो था ही ऐसा। भीड़ भाड़ अच्छी लगती पर ऊब भी जल्द ही जकड़ लेती थी। यूँ वो ऊबा हुआ नहीं रहता था। वो अपनी ज़िन्दगी से लगभग खुश ही था। फ़िर भी ऊब का एक जंगल उसके चारों ओर उगा रहता था। उसके पास सब था और वो लगभग संतुष्ट था पर यही संतुष्टि उसे एकरसता की ओर धकेलती थी। उसे किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। यही बात उसके आस पास अनजान ज़रूरतों का अम्बार लगा देती। वो अपने आप को पसंद करता था मगर फ़िर भी उसे खुदपसंद नहीं कहा जा सकता था। वो औरों को भी उतनी ही शिद्दत से चाहता था। वो अच्छा आदमी नहीं था मगर वो बुरा भी नहीं था। हाँ लोगों ने उसे ज़रूर इन खाँचों में फिट करने की कोशिश की थी। लेकिन वो किसी को कुछ नहीं कहता। वो अपने हिस्से यूँ ही लोगों के सुपुर्द करता चला जाता और लोग अक्सर उसे ग़लत समझ लेते।पर अब उसने इन बातों का असर लेना छोड़ दिया था।



उसने फ़िर खिड़की से नीचे देखा। ईंट की दीवार को पेस्टल ग्रीन में रंग कर एक छोटी सी फ्रेमजड़ित खिड़की बनी हुई थी।आस पास रंग बिरंगे फूलों की लतरों ने खिड़की को घेर रखा था। उसी खिड़की से स्टेडियम नज़र आ रहा था। सब कुछ असली था मगर फ़िर भी आभासी प्रतीत हो रहा था। उसने तसल्ली के लिए एक एक चीज़ को छू कर देखा। फूलों से गंध फूट रही थी। दीवार खुरदुरी थी जैसे ईंट की दीवारें होती हैं। और खिड़की असल में खिड़की ही थी कोई फ्रेम नहीं कि बाहर का सब नज़र आ रहा था। आठवें माले से दृश्य सुन्दर दिखाई दे रहे थे। वो कुछ देर एकटक देखता रहा जिस्म को गुनगुनाने वाली तपिश धीरे धीरे अन्दर उतरने लगी थी। स्टेडियम में खेलने वाले बच्चे पसीने में तर हो गए थे और अपने अपने स्वेटर उतार एक पत्थर पर रख चुके थे। वे अब भी खेल में मशगूल थे। उसे अपने भीतर भी गर्मी उतरती लगी। उसने अपना ओवरकोट देखा।उसे उसकी याद आई जिसने यह भेंट किया था। उसने कोट के फ़र में अपना मुँह छिपा लिया। एक अजीब सी गंध उसके नथुनों में उतर गयी। उसे याद आया घर से निकलने से पहले उस जगह उसने पेरिस में बना हुआ कोई महँगा इत्र छिड़का था। गंध से उसे उबकाई आने लगी। घबरा कर उसने उसे उतार दिया। वो उसे बेहद प्यार करती थी। प्यार वो भी करता था पर हदों के भीतर ही। असंतुलित प्रेम संतुलन की खोज में तड़क गया। उसने कभी उसे लौटाने की कोशिश नहीं की और वो लौटना चाह कर भी नहीं लौट पायी होगी। धीरे धीरे सब बिसरा गया। यूँ भी वो लंबे वक़्त तक एक चीज़ के पीछे कभी नहीं भागा। ट्रान्सफर वाली नौकरी में नए शहरों के साथ नए लोग भी बराबर मिलते रहे और सभी बेतहाशा प्यारे। उसने जी भर कर प्यार किया। अलग अलग लोगों से अलग अंदाज़ में प्यार। पर उसका मन नहीं भरा । वो आगे बढ़ता रहा और प्यार करता रहा। 


ओवरकोट खोलते ही सर्द लहर जिस्म से टकराई तो उसे अच्छा लगा। उसे लगा वो किसी पहाड़ पर आ बैठा है। उसे याद आई बिल्लौरी आँखों वाली एक लड़की जिसे पहाड़ों का बहुत शौक़ था। वो हमेशा उसके साथ पहाड़ों पर जाने की बात किया करती थी। और वो उसकी मासूम ख्वाहिश को बेवकूफी मान हँसी में उड़ा देता था।ऐसा नहीं था कि पहाड़ उसे पसंद नहीं थे। बस उस लड़की का साथ उसे इतना पसंद नहीं था कि पहाड़ का सफ़र तय किया जा सके। उस बीस साला लड़की में बहुत आवेग था। उसके लिए हर चीज़ नयी थी इसलिए सब कुछ आकर्षित करता था।उसे रोमांच पसंद था जबकि वो ये उम्र पीछे छोड़ आया था। वैसी बातें वो बहुत लड़कियों से सुन चुका था अपनी जवानी में। चुलबुलापन उसे अच्छा लगता पर अब ठहराव उसे ज़्यादा आकर्षित करता था। यूँ भी उसे नयापन भाता था। जैसे उसकी बिल्लौरी आँखें।हरे नीले के बीच का कोई रंग पानियों में घुला हुआ। इन्हीं आँखों के लालच में उसने उस लड़की को रोक रखा था। पर सबकी तरह वो भी एक दिन चली गयी थी। किसी के जाने के लिए कोई कारण ज़रूरी नहीं होता जैसे इन सबका उसकी ज़िन्दगी में होने का कोई सबब न था। 


पास वाली टेबल पर बैठे लोग उठ खड़े हुए थे। कितनी देर हो गयी उसे यहाँ बैठे हुए? आदतन उसकी नज़र अपनी कलाई घड़ी पर गयी। अभी तो मात्र एक ही घंटा बीता है उसे यहाँ आये हुए। घड़ी को उसने और पास से देखा। उसके डायल पर सुनहरी अक्षरों में उसका नाम लिखा हुआ था।अक्षरों की बनावट भी बेहद सुन्दर थी। यह भी उसकी एक प्रेमिका ने ही दी थी। नयी नयी जब थी तब दिन में कई बार अपना नाम देखा करता था पर अब पिछ्ले बहुत समय से वो ऐसा करना छोड़ चुका था। आज अरसे बाद उसने अपना नाम देखा। नाम इस तरह था कि अंग्रेज़ी के एस अक्षर का घेरा उसे पूरी तरह घेर लेता था। उस लड़की का नाम भी तो एस से ही शुरू होता था। वो हँस पड़ा। दो नामों को मिला देने भर से दो लोग नहीं जुड़ जाते। प्रेम में पड़े हुए लोगों की सनक अजीब होती है। प्रेमी को अपनी निशानियों से लाद देने की ख्वाहिश हमेशा ही बनी रहती है। पर उसने कभी ऐसा नहीं किया। वो शायद कभी प्रेम में पड़ा ही नहीं या इतनी बार प्रेम में पड़ा कि लोगों को निशानियाँ दे पाना संभव ही नहीं था। पर वो लड़की उसे बेहद अजीज़ थी। खूबसूरती और ज़हनियत का ऐसा प्यारा सम्मिश्रण उसे फ़िर देखने न मिला। वो चाहता था कि वो हमेशा के लिए उसके पास रह जाए पर लड़की को उसका टूटा फूटा वजूद मंज़ूर न था। और खुद को किसी के लिए बदलना उसके बस में न था। वो भी चली गयी थी। 


उसने कुछ स्नैक्स आर्डर किये थे। वे आ गए थे।बैरे ने सर्व करने के लिए पूछा पर उसने ना में सर हिला दिया। खाना परोसने का उसका अपना ढंग था। पत्नी की लगायी हुई प्लेट भी कभी उसे पसंद नहीं आई। पर हाँ उस लड़की के साथ एक प्लेट में उसने बहुत बार खाया है। उसके नर्म हाथ खाने को और लजीज़ कर दिया करते थे। पनीर को काँटे में फंसा उसने मुँह में लिया था। पनीर का टुकड़ा मुँह में रखते ही गल गया था। वो हमेशा उसे खाली पेट पीने को मना किया करती थी। इसलिए अब वो भूख न होने पर भी खाने का आर्डर ज़रूर दे दिया करता है। वैसे लड़की को कभी समझ न आया कि खाली पेट होते हुए भी भूख कैसे नहीं लगती और उसकी इस बात पर वो खूब हँसा करती थी। पर उसे अरसे से भूख नहीं लगी। बस वो वक़्त पर खा लेता है एक नियमित दिनचर्या से बंधा हुआ। 


खाने के स्वाद से भी उसे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। शादी के तुरंत बाद पत्नी ढेर सारे लजीज़ व्यंजन बनाया करती थी पर उसकी ओर से कोई प्रोत्साहन न पाकर पत्नी का सारा उत्साह धीरे धीरे चुक गया था। उन दोनों में झगडा नहीं होता था। वो अपनी बीवी पर हाथ भी नहीं उठाता था। उसकी देह का अन्वेषण भी लगभग हर रात ही करता था।फ़िर भी एक अजब चुप्पी दोनों के दरमियाँ हमेशा रही। इस बर्फ को तोड़ने की पहल किसी ने नहीं की। वो किसी को दुखी नहीं करता था पर फ़िर भी कोई उस से खुश न रहता था। वो खुद को कभी समझ न पाया। कोई और उसे समझ पाए इतना मौका वो किसी को नहीं देता था। लोगों को लगता वो अस्थिर है या शायद मानसिक रूप से बीमार। पर वह अस्थिर होने से अधिक बहु आयामी था। उसका प्रेम भी उसी की तरह बहुआयामी थी। पुराने बरगद की भाँति उसकी शाखाएं अगणित तरीके से फैली हुई थीं और हर शाख से रिसती थी प्रेम की इच्छा लेकिन उन सब के सिरों के बीच खालीपन था। इस खालीपन से फिसलते हुए नितांत अकेलापन उसके जीवन में प्रवेश कर गया था। इस खालीपन को भरने की उसने हर संभव कोशिश की पर ये भरने में नहीं आया। या शायद ये खालीपन उसके जीवन का अभेद्य रहस्य था जिसे वो खुद भी कभी नहीं भेद पाया। इसका होना उसकी आदत हो चुकी थी। उसके आस पास बहुत लोग थे। उसके खुद के चुने हुए। पर उसे लगता वो कोई जंग खाया हुआ पुराना ताला है जिसकी चाबी खो गयी है बरसों से इकट्ठे होते जा रहे चाबियों के ढेर में। इसी तरह लोगों की गिनती बढ़ती जा रही थी पर जिसकी तलाश थी वो उनमें से कहीं नहीं। फ़िर भी

वो पात्र चुनता। वो प्रेम करता। उसे सुख मिलता। कुछ समय बाद सुख वाष्पित हो उड़ जाता। वो फ़िर सुख की तलाश करता। सुख उसे प्रेम में ही आता था। वो फ़िर प्रेम करता पर वो अपने भीतर का हिस्सा किसी से नहीं बाँट पाया। असंख्य लोगों से मिलने के बाद भी उसे कोई नहीं मिला जिससे अपना मन बाँटा जा सके। दरअसल उसके पास दिखाने के लिए कोई स्वरूप था ही नहीं। वो प्रेत की भाँति अरूप था। काँटा खाली प्लेट से टकराया तो पता लगा कि स्नैक्स ख़त्म हो चुके थे। 


बच्चे अपना अपना सामान समेटने लगे थे। वे घर जा रहे थे। शायद उनको भूख लग आई होगी। वे घर जायेंगे और उनकी माएँ उनसे लाड़ जताते हुए उन्हें खाना देंगी।


वेटर खाने का आर्डर लेने आया था। उसने न चाहते हुए भी खाना आर्डर किया। बीयर की जगह व्हिस्की ले चुकी था। अब उस पर हल्का सुरूर तारी हो रहा था। उसने देखा बगल वाला जोड़ा चुम्बन में रत है। वो कुछ देर उनको अपलक देखता रहा। मन ही मन उनके चूमने की तकनीक का विश्लेषण करता रहा। फ़िर अचानक असहज हो लड़की ने गर्दन तिरछी कर उसकी ओर देखा तो उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया। बेहतरीन तरीके से चूमने वाली एक स्त्री उसके जीवन में आई थी। असीम धैर्य और अनूठेपन से वो उसे चूमा करती थी। उसके चुम्बन बेहद उत्तेजक होते थे। उसके निचले होंठ को अपने दोनों होंठों के मध्य दबा ऐसा स्वर उत्पन्न करती कि वही नहीं कोई और भी सुनता तो उसका रोम रोम पुलकित हुए बिना न रहता। इस साधारण सी क्रिया को मुँह के सारे अवयवों का इस्तेमाल कर वो इतना मनोरंजक और रुचिकर बना देती थी कि उसका मन ही न होता था वो स्त्री के होंठ छोड़ दे। इस विधा में वही उसकी शिक्षक थी। आगे जाकर कई स्त्रियाँ इसके कारण उस से अभिभूत हुई थीं।


एक पैग ख़त्म हुआ तो उसने गिलास फ़िर से भर लिया। किनारों पर नक्काशी किया हुआ नाज़ुक काँच का गिलास। अगर वो उसको तोड़ दे तो पल भर में उसकी खूबसरती चकनाचूर हो जाएगी। पर वो ऐसा नहीं करेगा। उसने गिलास को प्यार से सहलाया और फ़िर से पीने लगा। सुन्दरता उसे कभी नष्ट कर देने वाली चीज़ नहीं लगी। उसने सुन्दरता का पान किया। उस से अपना मन बहलाया पर कभी उसे रौंद कर मसला नहीं। उसके आस पास औरतों का जमावड़ा हमेशा लगा रहा। उसकी कौन सी बात पर वो रीझी रहतीं ये कहना मुश्किल है पर जिस तरह तितलियाँ परागकणों के लोभ में फूल पर मंडराती हैं उसी तरह स्त्रियाँ सदा ही उसके इर्द गिर्द रहीं। लोग कहते कि वो इनको फुसलाता है। पर फुसलाना क्या होता है वो कभी नहीं समझ पाया। किसी के साथ होना या न होना एक व्यक्तिगत निर्णय होता है। वो बहुतों के साथ होना चाहता है तो कहाँ गलत है। पर शायद स्त्रियों के नाज़ुक मन की थाह वो नहीं ले पाया जो अपने अलावा किसी और को उसके नज़दीक बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं।


उसे अपने इस हुनर पर गर्व था। वो मन ही मन खुश होता था कि वो जिसे चाहे उसे पा सकता था। अपनी ज़िन्दगी के इन सारे सालों में उसने यही किया था। उसे कोई महँगा शौक़ नहीं था। कम से कम चीज़ों में गुज़र करना उसे बखूबी आता था। बस एक इसी इच्छा पर उसका बस नहीं था। उसे जो अच्छा लगता उसे अपना बना लेने की चाहत उसके मन में पनपने लगती। और किसी का अच्छा लगना लगभग अंतहीन ही था। किसी में कोई खूबी होती तो किसी में कुछ। यह सिर्फ शारीरिक आकर्षण ही सीमित नहीं था। स्त्रियों की बौद्धिकता उसे ख़ास तौर पर आकर्षित करती थी। सजी सँवरी स्त्री से ज़्यादा उसे स्थिर और तेज़ दिमाग आकृष्ट करता था। कई बार इस सीमा तक कि उनकी शारीरिक बनावट गौण हो जाती। लेकिन कई बार उसके भीतर का आदिम पुरुष जाग उठता जो किसी स्त्री की सुन्दरता देख उन्माद से भर जाता। और वे स्त्रियाँ वाकई अद्वितीय सुंदरियाँ ही होती थीं जो उसके भीतर के बुद्धिजीवी को सुप्तावस्था में पहुँचा दिया करतीं थीं। उसने अपने आप को इस सीमा तक स्वीकार लिया था कि उसे इसमें कुछ भी ग़लत नहीं लगता। उसके पास बाँटने को बहुत प्रेम था जिसकी वृष्टि वो ढेर सारे लोगों पर अलग अलग वक़्त में करता रहता। उसे लोगों की मानसिकता कभी समझ नहीं आई जो प्रेम के नाम पर बंधन चाहते थे। प्रेम तो अनंत होता है। एक से करो या अधिक से, विकृतियों से दूर विशुद्ध प्रेम होना चाहिए। पर लोग उसे दिलों से खेलने वाला इश्कबाज़ घोषित करने में ज़रा देर नहीं लगाते। जो औरतें प्रेम का दंभ भरतीं वे उसके इस शौक़ के बारे में मालूम होते ही उसे गालियाँ देने लगतीं। उसका प्रेम पल्लवित होने से पूर्व ही दम तोड़ देता। वो नहीं समझ पाता कि जब वो लोगों को जिस रूप में वे हैं स्वीकार लेता है तो कभी भी कोई और उसे क्यों वैसा ही नहीं स्वीकार पाया। वो तो अपना सम्पूर्ण,प्रेम को अर्पित कर देना चाहता है। प्रेम के इतने व्याख्यान पुराणों में हैं पर उसका प्रेम सबको दोषयुक्त ही लगता आया सदा।


बगल वाला जोड़ा उठ खड़ा हुआ था। लड़की के हाई हील्स उसे आकर्षक लगे। उसे इस तरह देखता पा लड़की ने लड़के के कान में कुछ कहा। लड़के की मुद्रा आक्रामक हो गयी पर लड़की ने उसे शांत किया। परवर्ट जैसे कुछ शब्द तैरते हुए उस तक आये और दोनों उस पर घृणा वाली नज़रें डाल चले गए। वो मुस्कुरा उठा। 


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