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रजनी मोरवाल की कहानी ‘खूबसूरत फूल के लिए’

रजनी मोरवाल के कहानी संग्रह ‘कुछ तो बाकी है’ के प्रकाशन के बाद से उनकी कहानियों की खूब चर्चा हो रही है. उनकी कहानियां चर्चा के लायक हैं या नहीं आप खुद पढ़कर बताइए- मॉडरेटर
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मुंबई के मौसम का कुछ पता नहीं चलता, बहुत बंकस करता है सब तरफ चिप-चिप, जररा सी झमाझम हुई नहीं की ये इलाका फ़चाफ़च करता है, ली लियांग को बस यही बात परेशान करती है | मुंबई मस्त पण इधर की बारिश पस्त कर देती है” ली लियांग को ‘कॅमलिंग’ की लाउंज में मच्छरों का आतंक सहना पड़ता है, बूंदें पड़ते ही अक्खा मुंबई मरीन ड्राइव के किनारे भेला हो जाता है…व्होह टेम में मरीन ड्राइव बोले तो सुवर्ग नज़र आता है, कपल्स लोग कईसा फिट होके बैठता है…एकदम मस्त सीन होता है रोमांटिक और चिपका चिपकी वाला |” ली लियांग कुढ़ के रह जाता है, शायद अपने एकाकीपन से या अपने हालातों से पता नहीं पर उसे बहुत गुस्सा आता है इन कपल्स को देख कर |

   कभी-कदार तो ली लियांग को इधर के लोग भी मोइस्ट-मोइस्ट लगते हैं- “मोइस्ट-मोइस्ट ,च्या माईला… बोले तो…..जैसे शरीर से गीले और माइंड से थकेले, सब ओर बोले तो भागम-भाग माइला, “जास्ती टेम किसी के पास नईच” ली लियांग सोचता रहता है-

“मई किधर से आया रे बाबा इस शहर में ? कहने को माँ-बाप नहीं, रहने को छप्पर नहीं, कोई सगाच पण नईच अपुन का इस शहर में, कोई पण नैपाली बुलाता है तो कोई चीनी, बस चेंग हीच अपुन को थोड़ी बहोत चाइनीज़ सिखाया, चाइनीज़ बहोत आस्ता से समझ में आईला अपुन को ….चेंग बोलता है मई चाइनीज़ है तो इसके वास्ते मई भी अपुन को चाइनीज़ समझ के रखा है…फेसकट भी तो अपुन का चाइनीज़ लोगों से मिलता-जुलता है, चेंग तो मेरा बाप के माफक लगता है | उसकी चिंगी-चिंगी आँखें भी तो अपुन के माफक ही है …रंग भी तो है सेम-टू-सेम ऐसा कि जैसे फटेला दूध ….” और ली लियांग अकेले में खी…खी करके हंसने लगता है | मरीन ड्राइव से वापिस लौटते वक़्त दाहिने हाथ की तरफ ‘गेलार्ड’ रेस्त्रां पड़ता है उससे ज़रा आगे चलते रहो तो बाएँ हाथ की तरफ पेवमेंट की रेलिंग से सटकर ‘केमलिंग’ रेस्त्रां है, ली लियांग बरसों से वहीं डटा हुआ है |

  किउ की माँ भी शायद वहाँ आती रही होगी, उसके पिता का पता नहीं कि वह वहाँ आते थे या नहीं पर जब माँ है तो पिता का होना तो निश्चित ही होगा | उसकी माँ कहाँ से आई थी ? यह तो किसी को नहीं पता किन्तु किसी ने बताया था वह अक्सर मरीन ड्राइव पर घूमती दिख जाया करती थी और कइयों ने तो उसकी माँ को अकेले-अकेले मुस्कुराते भी देखा था | वैसे ऐसा व्यहार व्यक्ति तब करता है जब वह प्यार में होता है …तो क्या किउ की माँ किसी के प्यार में थी ? बहरहाल यह सब जवाब किउ ढूँढे …हमें क्या ? हम तो सिर्फ किउ को जानते हैं उसके परिवार को नहीं | किउ तो फिलहाल किसी से प्यार नहीं करती क्योंकि वह अक्सर सुबकती रहती है, अगर प्यार में होती तो मुस्कुराती ….खिलखिलाती | शरीर में यह जो एक बेरहम सा अंग है न…पेट जिसे कहते हैं, यह किसी को मुस्कराने नहीं देता वह भी बेवजह तो हरगिज़ भी नहीं | ली लियांग जानता है, वह सुबह से शाम तक रेस्त्रां में खटता है और ‘कॅमलिंग’ लाउंज में पड़ा रहता है, कहने को चेंग उसका सबकुछ है लेकिन उसके एकाकीपन को कौन झेले ? एकाकीपन तो सबका निजी होता है फिर ये एकाकीपन किउ का हो, ली लियांग का या फिर चेंग का, बहरहाल कोई नहीं मुस्कुराता यानिकी फिलहाल कोई भी किसी के प्यार में नहीं है |

  ट्रे उठाकर पास से गुजरते हुए ली लियांग ने कोने की मेज़ पर बैठी किउ को देखा जो उस वक़्त अकेली ही वहाँ बैठी थी | आमतौर पर व्यवस्थित रहने वाली किउ के काले रेशमी बाल आज बेतरतीब­-से फैले थे | माथे पर ढुलक आई लटें बाँई ओर के गाल पर से होती हुई एक तरफ से होठों को छू रही थी जैसे जानबूझ कर उन्हें इस प्रकार से गिरने के लिए ढीला छोड़ दिया गया हो | ली लियांग को चिढ़-सी हुई | अगर ये लड़की उसकी कौम की न होती तो वह उसे कभी इस रेस्तराँ में घुसने न देता | मगर कैसे ? रेस्तराँ तो चेंग का है वह तो यहाँ वेटर मात्र है | वेटर जो सिर्फ वेट करता है लोगों के बार-बार कन्फ्युज होते मेनू को देखकर अथवा उनके अजीबोगरीब ऑर्डर के इंतज़ार में…कभी-कभी खाना सर्व करने में देरी हो जाए तो उसे बिल  में फेरबदल का वेट करना पड़ता है कई मर्तबा जब सैफ की गलती से मेनू में परिवर्तन हो जाए तो ली लियांग ढीठ बन जाता है और उनकी झिड़कियों का वेट करता है | हाँ, टिप उसे जरूर सुहाती है जब सौंफ और मिश्री की तश्तरी के साथ-साथ वह टिप के पैसे उठाता है न तो बिन खाए भी सौंफ और मिश्री की मिठास उसकी जुबान ना….ना…उसकी जेब में घुल जाती है और वह गदगद हो उठता है | वह इस मुंबई शहर में अपनी एक खोली लेना चाहता है, वैसे उसने एकाध जगह बात भी कर रखी है पर उतने ढेर सारे पैसे जो उसके पास इकट्ठे नहीं हुए …कभी ना कभी तो होंगे, इसी उम्मीद पर मुंबई की दुनिया कायम है और मुंबई में कदम रखने वाला हर शख्स इसी सपने को साधे अपना दम फुलाए रहता है सो ली लियांग भी क्या अनूठा कर रहा था ?

  ली लियांग को आज भी याद है बरसों पुरानी वह रात, जब कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए वह इस रेस्तराँ के बाहर आ दुबका था | ड्रैगन का आकार लिए लाल रंग की बड़ी-सी लालटेन के नीचे  उसने कुछ गर्मी महसूस की थी वह राहत पाकर वहीं ठिठक गया था | ऊपर देखा तो अंग्रेजी और चाइनीज भाषा में लिखा था ‘कॅमलिंग’ | मुंबई जैसे महानगर में महीनों भटकते रहने के बाद इस चाइनीज रेस्तराँ को देखकर आज उसे कुछ अपनापन-सा लगा था और वह सीढ़ियों के कोने पर ही दुबक कर सो गया था | अगली सुबह रेस्त्रां का गेट खोलते हुए चेंग ने टोर्च की रोशनी उसके मुँह पर मारी थी “कौन है वहाँ ?” चेंग ने कडकदार आवाज़ में पूछा था डर के मारे उसकी चीनी आँखे और भी मिचमिचा गई थी, उसकी घिग्घी बंध आई थी और वह सिकुड़ कर लाल प्लास्टिक वाले डिवाइडर के पास जा सटा था जैसे वह अदृश्य हो जाना चाहता हो | कई दिनों से भूखे-प्यासे भटकते रहने की वजह से उसकी आंतों में अकुलाने की अजीब-अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं और एक आवाज़ उसके दिमाग में भी हथोड़े मार रही थी वह थी भूख….भूख और वह लगभग बेहोश हो चुका था | किन्तु यही कहानी चेंग की अनुपस्थिति में वह अपने नए दोस्तों को नए अंदाज़ में पूरे आत्मविश्वास से सुनाता है “जैसेच चेंग ने फुल्ल बत्ती मारी थी टोरच की मेरे मुंह पे, मैं ज़रा नहीं घबराया था, क्या करता जास्ती-जास्ती चेंग मेरे को भगा देता …मई बिलकुल खौफ नहीं खाया था उस टेम भी जब मई दस बरस का छोकराइच था ….अब चेंग को मेरे जरूरत थी इस वास्ते व्होह मेरे को उठाके सीने से लगाया, मेरे जैसा वफ़ादार छोकरा उस को किधर से मिलेंगा ? व्होह मेरे को अपने सगा बेटा के माफक प्यार करता है मालूम ?”

  चेंग बड़ा दयालु व्यक्ति है, उसने ली लियांग को घर वापस पहुँचाने का भरसक प्रयत्न किया था | घर के बारे में ली लियांग को कुछ अता-पता ना था | उसे याद था तो जमाने की ठोकरें , बदन पर चिथड़े और पेट की अग्नि जो जाति, नस्ल, रंग और नाम को जलाकर राख़ कर देती है, एक पेट ही तो था जो पूरी देह में उस वक़्त सर्वोपरि था उसके लिए | जब चाइना टाउन और चाइना गेट से लेकर मुंबई की अन्य चायनीज बस्तियों में भी ली लियांग का कोई रिश्तेदार ना मिला तो चेंग ने उसे अपने ही रेस्त्रां में वेटर रख लिया था | तभी से “कॅमलिंग” ही ली लियांग का पता-ठिकाना बन गया है | चेंग को वह पिता स्वरुप मानता है और “कॅमलिंग” पर अपना अधिकार समझता है इसीलिए जब किउ जैसी लड़कियाँ इन लड़कों के साथ यहाँ आती हैं तो वह  चिढ़ उठता है, खासतौर पर किउ से | हँसती इठलाती किउ की टेबल पर जब कभी वह खाना सर्व करने जाता है तो एक घूरती हुई नज़र उसके साथ बैठे हुए लड़के पर जरूर डालता है | कभी-कभार तो उसका मन करता है कि वह गर्मागर्म खाना इन लड़कों पर गिरा दे या फिर इन लड़कों को जमकर पीट डाले | ली लियांग मन-ही-मन उन्हें बिगड़े शहज़ादे कहता था | अक्सर ये लड़के उसी के हम उम्र होते थे | “इनके पास ऐसा क्या है जो मेरे पास नहीं ? बस पईसा है और प्यार का क्या ?….व्होह तो किधर है ? सब स्याला….पेनचौभ…..बिगड़ैल औलादें हैं, इनपर रईसी का नशा है जो जवानी की पेंट में फूटता है फिर ज़िप से उछलकर बाहर कूदने पर उतारू हो जाता है, पण किउ यह सब क्यों नहीं समझती ? या समझती है तो मुकर क्यों नहीं जाती इस गलीच जीवन से ? किउ कैसे सूरजमुखी-सी पीली पड़ गई है बेचारी |”

   किउ हमेशा कार से उतरकर कोने वाली मेज़ पर बैठ जाती थी जहाँ अपेक्षाकृत अधिक अँधेरा रहता है | शायद अपने ग्राहकों के पैरों में पैर डालकर बैठने में उसे वहाँ सुविधा होती होगी | मगर जब भी उसका कोई ग्राहक उसे ‘किस’ करने के लिए आगे बढ़ता है तो किउ ‘किस’ करने से पहले एक बार वह आस-पास ज़रूर देख लेती थी, ज़्यादातर तो वह अपनी हथेली आगे बड़ा देती थी और यदि ग्राहक ज्यादा चिपकू निकले तो वह खिसियाकर अपना गाल उसके आगे कर देती थी | ली लियांग ने नोटिस किया था कि किउ  अक्सर अपने होंठ बचा लेती थी | इसी कारण से ली लियांग को लगता था कि शायद किउ इस धँधे में मजबूरी के तहत आ फँसी होगी | “गंदा है पण धंधा है …क्या करेगी व्होह ? ज्यासती पढेली होती तो किधर क्लार्क लग जाती, पण इस मुलुक का रेशेन कारड़ किधर से लायेंगी बिचारी ? उसका भी केस अपुन के माफक हिच तो है |”

  ली लियांग को ऐसे लड़कों से सबसे ज्यादा चिढ़ तो तब होती है जब वे किउ के साथ  सिर्फ़ वक़्त गुजारने के लिए हर आधा-आधा घंटे में खाना आर्डर करते रहते हैं फ़िर पूरा का पूरा खाना टेबल पर छोड़कर चले जाते हैं | इतने महँगे खाने को इस तरह बर्बाद होते देखकर वह खीज उठता है | कितने लोगों का पेट भर सकता है इस बचे-खुचे खाने से मगर छोड़े हुए खाने की जगह सिर्फ़ डस्टबिन ही रह जाती है | हाँ, ऐसे लोग टिप तगड़ी छोड़ जाते हैं, जिन्हें वह बुरे वक्तों की अमानत समझकर जेब में ठूँस लेता है | चेंग के पास टिप की एक तगड़ी रकम भी बचत के तौर पर उसने जमा करवा रखी है |

  उस रोज़ माजरा कुछ अलग ही था | किउ अकेली बैठी थी और उसने सिर्फ़ एक कप कॉफी मँगवाई थी |  दो घंटे पहले मँगवाई गई कॉफी भी अब तक पड़ी-पड़ी ठंडी हो चुकी थी | वह न जाने किन ख़्यालों में गुम थी | ली लियांग ने उसकी मेज़ पर जाकर पूछा था- “आपको कुछ ओर मंगता है क्या  मैडम ?” किउ ने अचकचाकर उसे ऐसे देखा था जैसे वह गहरी नींद से जागी हो और इसी हड़बड़ाहट में उसके गालों पर बड़े यत्न से सहेजी गई बालों की लटें हवा से उड़ गई थी, बालों के हटते ही उनके भीतर करीने से छुपाया ज़ख़्म व सूजी आँखें भी ली लियांग को नज़र आ गई थी | घबराहट छिपाने के लिए किउ ठंडी कॉफी ही सिप करने लगी थी | ली लियांग को किउ पर दया आ गई थी और वह पूछ बैठा था “कोई परेशानी है मैडम, कोई लफड़ा हुआ क्या ?” किउ उसकी तरफ देखकर सिसक उठी थी | बिना कोई जवाब दिए और बिल चुकाए बिना ही वह बाहर निकल गई थी |

ली लियांग कप उठाता हुआ गुस्से से बोला था – उंह… ‘लेफ्ट ओवर कॉफी’ |

उसने अपनी जेब से कॉफी के पैसे जमा करवाते हुए चेंग से पुछा था ‘है कौन यह लड़की ? काहे का घमंड है इसकू ?” अमूमन शांत रहने वाला चेंग उस दिन बेचैन हो उठा था, उसकी आधी-सी बंद आँखों में कुछ तरल पदार्थ तैर गया था | चेंग को आमतौर पर रेस्त्रां में और उसके आस-पास के लोगों ने चुप ही देखा है, दारू का नशा उसपर कभी नहीं चढ़ता फिर भी किउ के बारे में सुनकर उसकी आँखों में यह क्या मिचमिचा आया था ? जो हूबहू किउ की पलकों पर तैर आए गीलेपन की तरह ही आद्र था ? उनकी आँखों में दर्द का यह क्या खारापन था जो ली लियांग को भी द्रवित कर गया था ? वह चेंग का खुमार तो हरगिज़ नहीं था शायद अपनी मिट्टी की नमी थी जो किउ के बहाने उसके जेहन से होती हुई उस वक़्त उसकी आँखों में भी उतर रही थी |

चेंग अपने लकड़ी के मग में गर्म वाइन पीता हुआ ढ़ेर सारे ऑप्सन्स देने लगा था –

“हमारी ही तरह अनजान भटक रही होगी इस देश में, कोई छोड़ गया होगा, शायद अनाथ हो या फ़िर किसी नाजायज गली की उपज होगी, तू अपना काम कर |” ली लियांग को चेंग की बात समझ में नहीं आती, ” ये क्या हैबिट है यह चेंग की …एकदम नारियेल, ऊपर से सखत और अंदर से नरम, ऊपर से मूँज के माफक तो अंदर से गिरि के जईसा सॉफ्ट |”

   आमतौर पर किउ से चिढ़ने वाले ली लियांग को उस रोज़ उससे कुछ सहानुभूति क्यों हो रही थी | उसकी निगाहों के समक्ष किउ का उदास चेहरा, सूजे होंठ और बाएं गाल का रिसता हुआ ज़ख़्म तैर रहे थे | किउ की आँखों की नमी देर रात तक उसे परेशान करती रही थी | ली लियांग दुविधा में था, जिस लड़की से हमेशा उसे चिढ़ होती थी उसी पर आज उसे हमदर्दी क्यों उपज रही थी ? वह अपनी व किउ की परिस्थितियों का अवलोकन करने लगा था | किउ भी उसी की तरह इस शहर में अनाथ थी, पेट की अग्नि शांत करने के लिए बिचारी ने अपने दामन को ही आग के हवाले कर दिया था | चूँकि ली लियांग पुरुष था उसके लिए इस महानगर में काम ढूँढना उतना मुश्किल नहीं था किन्तु किउ जैसी अकेली व अनाथ लड़की के लिए अपने-आप को सलामत रखते हुए गुज़ारा करना वाक़ई कठिन रहा होगा | ली लियांग किउ के जीवन से जुड़ी कहानी जानने को बेताब हो गया था किन्तु किउ को तो जैसे उससे कोई लेना-देना ही ना था, वह तो किउ के लिए सिर्फ एक अजनबी था, किउ ने तो अपने इर्द-गिर्द शायद कभी ली लियांग की उपस्थिति भी महसूस नहीं हुई थी | किउ हमेशा एक खोल से लिपटी रहती थी जिसका बाहरी आवरण कौतूहल और परेशानियों की एक अनबूझ पहेली-सा था | उसके भीतर की दुनिया चाहे जितनी विस्तृत थी किन्तु उसके बाहर एक गहरा अचल सन्नाटा पसरा रहता था |

    यूँ तो कॅमलिंग में पूरे स्टाफ के पास सुनने-सुनाने को एक अलग कहानी थी | यहाँ हर कोई व्यक्ति अपने वजूद की तलाश में था | चेंग भी उनमें से एक है, चेंग एक भला आदमी है, न जाने उसकी कौनसी पीढ़ी यहाँ आई थी ? कैसे आई थी ? वह ख़ुद भी नहीं जानता, इसीलिए इस शहर में वह ली लियांग जैसे कितनों का सहारा बना हुआ है या यूँ भी कहा जा सकता है कि उनमें वह अपना सहारा तलाशता था |

   इस वर्ष ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ फरवरी की अट्ठाईस तारीख को पड़ा है, सब विचारों को परे झटककर ली लियांग उस रोज़ जल्दी सोना चाहता था क्योंकि अट्ठाईस फरवरी की सुबह चेंग ने पूरे स्टाफ को समय से पहले रेस्त्रां बुलाया था | ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ के लिए कॅमलिंग को नए अंदाज़ में सजाना था, बसंत के आगमन पर यह ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ लुनार महीने के प्रथम दिवस को मनाया जाता है और चाइना में हर वर्ष ये फेस्टिवल किसी ना किसी पशु को समर्पित किया जाता है 2016 ‘मंकी वर्ष’ था तो वर्ष 2017 को ‘रूस्टर’ यानिकी ‘मुर्गे’ को समर्पित है सो चेंग ने “कॅमलिंग” को भी मुर्गे की थीम में सजाने का कार्यक्रम बनाया है | चाइना से बक्सा भरकर सामान आया है, जिसमे लाफिंग बुद्धा, ड्रेगन की आकार लिए लाल-लाल लालटेन, फेंगसुई वाले कछुवे, काँच के पिरामिड, काँसे के सिक्के वाले विंड चाईम और बाँसों के आढे-तिरछे और भिन्न-भिन्न प्रकार के पौधे और मुर्गेनुमा लाल रंग के शेंडिलियर | “कॅमलिंग” व पूरा स्टाफ उस दिन लाल रंग में सराबोर रहेगा …लाल रंग समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, सुबह-सुबह रेस्त्रां के प्रवेशद्वार पर बने मंदिर में पूजा होगी, उस दिन चेंग अपने स्टाफ को मिठाइयों के साथ बोनस भी बांटता है |

  एक ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ ही तो है जब इतने सारे चाइनीज एक साथ देखने को मिलते हैं | पूरे फेस्टिवल के दौरान “कॅमलिंग” ठसाठस भरा रहता है | ली लियांग को हैरत होती है न जाने इतने सारे चाइनीज कहाँ से आ जाते हैं ? कुछ लोग पारंपरिक वेशभूषा में आते हैं तो कुछ मुंबईया अंदाज़ में आधुनिक वस्त्रों में आते हैं | कुछ अपनी बिरादरी के वजूद की बातें करते हैं तो कुछ बुजुर्ग अपनी जड़ों को बचाने की चिंता में लगे रहते हैं | नई पीढ़ी के बच्चे अंग्रेज़ी में संवाद करके अपने आपको मुंबई की मुख्य धारा से जोड़ देते हैं | ली लियांग अपने-आप को इनसे अलग-थलग पाता है क्योंकि वह ना तो चाइनीज़ भाषा जानता था, ना  अंग्रेजी | वह तो हिंदी और मराठी के साथ टूटीफूटी अंग्रेजी से काम चलाता है | इतने सारे चाइनीज़ लोगों को देखकर वह अक्सर अपने माता-पिता की काल्पनिक शक्लें बनाने लगता है | कभी-कभी किसी महिला या पुरुष की शक्ल किउ से मिलती-जुलती हुई लगती है तो वह किउ को उनकी अवैध संतान समझकर उनपर शक करने लगता है |

  पूरे सप्ताह भर कॅमलिंग में लोगों का ताँता लगा रहता है | इस दौरान ‘स्टाफ’ को तो साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती | इन दिनों “कॅमलिंग’ के मीनू में अपेक्षाकृत चाइनीज व्यंजन अधिक जुड़ जाते हैं और लज़ीज़ पकवानों से कॅमलिंग महक उठता है | ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ के हफ्ते भर तक चाइनीज लोग अपने-अपने परिवारों के साथ इन पकवानों का लुफ़्त उठाते हैं | ऐसे में ली लियांग अपने आपको बहुत उदास पाता है, इतने सारे चाइनीज परिवारों को देखकर उसे अपने अकेले होने का अहसास सताने लगता है | कभी-कभी वह इन सभी लोगों को अपना रिश्तेदार समझकर खुश हो जाता है, वह सोचता है रिश्ता खून का ना सही किन्तु शक्ल-सूरत, रहन-सहन, भाषा व संस्कृति के हिसाब से तो वह इनका ही हिस्सा माना जाएगा |

   दिन भर ली लियांग बस चुपचाप खाना सर्व करता रहता है | वह मेज़ साफ करते वक़्त बचे-खुचे खाने को अलग-अलग थैलियों में भरता जाता है, जिसे वह हर शाम कोलाबा के फुटपाथ पर गरीबों में बाँट आता है | चेंग की पहल पर कुछ दिनों से उसने इस बचे-खुचे खाने को गरीबों में बाँटने की शुरूआत की है तभी से उसे इस “लेफ्ट ओवर फ़ूड” से चिढ़ नहीं होती बल्कि उन गरीबों की दुआओं से शांति मिलती है जो हर शाम उसके इंतज़ार में टकटकी लगाए बैठे रहते हैं | उसे अहसास हो चला है कि बचे हुए खाने की जगह सिर्फ़ डस्ट्बिन ही नहीं होती |

   ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ के हफ्ते भर बाद तक भी जब तक किउ उसे कहीं नज़र नहीं आई थी तो ली लियांग को बैचेनी होने लगी थी, उसने किउ के बारे में चेंग से पूछताछ की थी, चेंग ने उसे भारी मन से बताया था कि- “किउ पेट से है, उसे दूसरा महिना चढ़ा है और तो और उसने आत्महत्या की भी कोशिश की थी पर किसी तरह से उसकी मकान मालकिन ने किउ को बचा लिया था | यह सुनकर ली लियांग तड़पकर रह गया था | उसके दिल में एक हुक-सी उठने लगी थी, किउ के प्रति उसकी नफ़रतें अपनी हदों को तोड़कर बहने लगी थी, उसका मन उस वक़्त अपने पेट से ऊपर उठकर सोच रहा था | उसे अपनी त्वचा के भीतर बहती नाज़ुक-सी नीली नसों में प्रहावित ऊष्मा में कुछ-कुछ महीन-सी झुंझुनाहट महसूस हो रही थी, वही ऊष्मा जिसे शायद लोग प्यार कहते हैं…. कुछ अरसा पूर्व उसे अखबार का एक पुर्जा हाथ लगा था, जिसमें किसी सफ़ेद दाढ़ी वाले व्यक्ति का एक लेख था …क्या तो नाम था उसका ? …हाँ, ओशो …उस पुर्जे में लिखा था कि “व्यक्ति को यदि किसी से प्रेम है ? तो प्रेम में गिरना क्यों ? यह मत कहो कि तुम किसी के प्रेम में गिर गए हो, यह वाक्य ही सरासर गलत है, यदि तुम्हें किसी से प्रेम है तो उसके प्रेम में ऊंचा उठो और उसके साथ ऊपर उठो न कि गिरो” …. इस पुर्जे के बाबत में उसने चेंग से पूछा था, चेंग ने उस समय जो कुछ समझाया था वह फिलवक्त में ली लियांग को पानी की तरह पारदर्शी दिख रहा था | वह आध्यात्मिक हो उठा था, वह सोच रहा था- वह उठ रहा है ऊपर बहुत ऊपर…इस कौम से, अपनी कर्मभूमि से, अपनी जन्मभूमि से और इंसानियत की बांधी हुई तमाम सीमा रेखाओं से …वह प्रेममय हो रहा था कभी बुदबुदा रहा था तो कभी मुस्कुरा रहा था वैसे ही जैसे किउ की माँ शायद मुस्कुराती होगी…उसे नहीं पता किन्तु लोगों ने बताया था, किउ की माँ किसीके प्यार में थी उस अजनबी पिता के बारे में शायद किउ को भी अंदाजा न था लेकिन ली लियांग जान गया था कि किउ एक दिन जरूर उसके साथ व उसके प्यार में मुस्कुराएगी….”यह ज़िंदगी अइसाइच है पल में नाना पाटेकर तो पल में जॉनी लीवर” वह खी-खी करके खुद ही अपने मुंबइया जोक पर हँस पड़ा था |

 वह किउ को जिंदगी जीने का एक और मौका देना चाहता था, उसके जीवन को सुंदर बना देना चाहता था या यूँ कह सकते हैं कि वह किउ के साथ-साथ अपने जीवन की प्रेम वर्षा में नहाना चाहता था, जीवन में छाए काले बादलों को हटाकर इंद्रधनुषी रंग देखना चाहता था | वह इस “स्प्रिंग फेस्टिवल” को अपने व किउ दोनों के लिए ख़ुशियों का प्रतीक बना देना चाहता था | वह जानता था कि वह एक वेटर है और किसी भी तरह से किउ के लायक नहीं है | उसके पास रहने के लिए सिवाय “केमलिंग” की लाऊंज के कोई और जगह भी नहीं है, वह तो खुद चेंग की दया पर निर्भर है | मगर चेंग ने उस दिन गले मिलकर ली लियांग का हौसला बढ़ाया था, उस वक़्त चेंग उसे सचमुच का सगा बाप लगा था | उसीने बताया था कि चाइना-टाउन कि गली नंबर-दो में किउ एक विधवा चाइनीज़ की पेइंग गेस्ट है |

   ली लियांग जान चुका था कि अब उसे आगे क्या करना है, उस दिन उसने रेस्त्रां से आधी छुट्टी ली थी, और दिनों से अलहदा उस दिन वह दाढ़ी व बाल सँवारने नाई की दुकान पर गया था | नए कपड़ों पर इत्र के छींटे मारता ली लियांग निरंतर मुस्कुरा रहा था |  शाम को उसने चेंग के पास बैठकर अपनी टिप से जमा किए पैसों का हिसाब लगाया था फिर डिनर के समय बड़ी चिरौरी करके उसने सैफ से “जिआओज़ी” बनवाया था, एक ऐसा व्यंजन जो पुराने समय को अलविदा व नए समय के स्वागत में बनाया जाता है | ली लियांग ने “जिआओज़ी” को असीम प्यार से निहारा था फिर बड़े जतन से उसे पेक करवाकर सुनहरे शब्दों में उसके ऊपर लिखा था -“किउ-एक खूबसूरत फूल के लिए…।”

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[ किउ = खूबसूरत फूल, ली लियांग = शक्तिशाली, फेंगसुई = चाइनीज वास्तु-विज्ञान, चेंग = खरा, जिआओज़ी = एक व्यंजन जो पुराने को अलविदा व नए के स्वागत में बनाया जाता है ]

  • रजनी मोरवाल

‘बैंक हाउस’

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जयपुर-302006

मोब. 9824160612

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