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गीताश्री की नयी कहानी ‘टच मी नॉट’


गीताश्री की कहानियों की रेंज बहुत बड़ी है. दुर्भाग्य से उनकी कहानियों के ऊपर ध्यान नहीं दिया गया है. एक तरफ उन्होंने गाँव-देहातों की सशक्त स्त्री पात्रों को लेकर कहानियां लिखी हैं तो दूसरी तरफ समकालीन जीवन स्थितियां उनकी  में सशक्त तरीके से उभर  हैं. मसलन, यही कहानी।  इसका अंत पुराने लोगों को चौंकाऊ लग  सकता है लेकिन युवा पीढ़ी को इसमें कुछ भी असहज नहीं लगेगा. पढ़कर बताइयेगा- मॉडरेटर 

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मुहल्ले की नई बहार थी वह. सबकी तरह आलोक को भी बहुत भाने लगी थी. वह चाहता था यह बसंत ठहर जाए. उसके घर में न सही, उसके आसपास. खूशबू आती रहे दूर से ही मगर, सामने हो चमन कोई कम तो नहीं…की तर्ज पर वह इन दिनों सोचने लगा था. पर चंचल खुशबू थी. उड़ती फिर रही थी.
वह टिकती कहां. वह किसी चित्रकार की तलाश में थी जिसके पास अपना बड़ासा स्टुडियो हो.
जहां रंग, ब्रश और बड़े बड़े कैनवस रख सके. थोड़ा एकांत और सुकून हो, जहां जब तक चाहे बैठ कर पेंट कर सके. कच्चे रंगों की महक से किसी को समस्या न हो. कुछ ऐसे ही इच्छाएं मुहल्ले के उजाड़ में उमड़ उमड़ कर आ रही थीं. जरुरतों से संचालित होने वाली इच्छाएं बहुत भगाती हैं.
गली नं चार के सारे मकान मालिक उसे कमरा , हॉल छत किराये पर देने को तैयार थे. मगर वह बहार किसी गुप्ता जी, मिश्रा जी, शुक्ला जी के नसीब में नहीं,  आलोक के नसीब में थी. गली नं पांच के प्रोपर्टी डीलर के साथ रोज रोज घूमते -भटकते -भागते एक दिन वह उसके स्टूडियो में धमक ही गई थी.
आलोक ने उसे देखा और बिना नखरे के स्टूडियो शेयर करने को तैयार हो गया. उसके स्टुडियो को उसने जिस तरस और प्रशंसा भरी निगाह से देखावह अपनी ही जगह से रश्क कर बैठा . पहली बार लगा कि उसने कोई बड़ा काम कर लिया है जिसके पास बहार खुद ठिकाना ढूंढने आई है. इससे पहले कि बहार का मन बदल जाए, फटाफट आलोक ने दो कमरो में से एक उसे दे दिया और अपने सारे सामान समेत दूसरे कमरे में शिफ्ट हो गया. छत कॉमन रखी गई ताकि बीच बीच में खुली हवा में सांस ली जा सके. बहार यानी मिस बहार दीक्षित। नाम सुनते ही आलोक का यकीन पक्का हो गया कि दीक्षित लड़कियां महासुदंर होती हैं और किस्मत वालों को ही उनका संग साथ नसीब होता है। उसने महसूस किया वह भाग्यवादियों सरीखा दिखने लगा है।  
वह अकेली हैं या दुकेली, इससे आलोक को कोई मतलब नहीं. वह बस अपनी नई साथी के साथ जीवन के बचे खुचे सारे कलात्मक पल बिता देना चाहता था. पूरी तन्मयता से उसने बहार का स्टुडियो वैसे अरेंज किया जैसा पहली बार अपने लिए किया होगा. पत्नी ने कितनी बार हाथ बंटाना चाहा पर वह इस जगह से परिवार को यथासंभव दूर ही रखता. आखिर दोनों की दुनिया भी अलग अलग जो थी. पत्नी रोज शाम मंडी हाउस के चक्कर लगाने जाती या किसी न किसी नाटक के रिहर्सल में लगी रहती, ठीक उसी वक्त आलोक अपने स्टुडियो में ब्रश लेकर बैठ रहा होता था. हाथ में स्कॉच का ग्लास और ब्रश. पास में ही कुमार गंधर्व का गायन चलता रहता. अब इन सबके अलावा कुछ चीजें और जुड गई थी. आलोक को लगा जैसे कैनवस पर कुछ नए रंग और इंट्रोडयूस हुए हैं अभी अभी. जो पहले कहीं नहीं थे…किसी की पेंटिंग में नहीं. जेहन में पिकासो का स्टुडियो कौंधा. अपनी अंतिम प्रेमिका के साथ मस्ती में थिरकते पिकासो और चारो तरफ बेतरतीब फैले ब्रश, रंग !
क्या सुखद संयोग है कि इतने साल दिल्ली के गढी स्टुडियो मे काम करते हुए पडोस में भी कोई बहार नसीब न हुई. महिला चितेरियां थीं पर वे सब नामचीन थीं और आलोक नया चेहरा…अपनी शैली की तलाश में भटकता हुआ..
यदाकदा गढी के खुले प्रांगण में भटकता हुआ खुद को दिशाहीन पाता और मायूस-सा फिर से अपने  दड़बेनुमा केबिन में घुस जाता. जल्दी से कुछ बड़ी बड़ी पेंटिग बना कर , उन्हें बेच कर अपना अलग स्टुडियो बनाने की तड़प पल रही थी जो एक झटके में पूरी हो गई.
दिल्ली की बड़ी गैलरी की मालकिन के साथ गढी में चक्कर लगाता हुआ एक बड़े होटल का मालिक, आलोक की पेंटिंग पर इतना फिदा हुआ कि उसका पूरा केबिन खाली हुआ सो हुआ, होटल के हर कमरे के लिए छोटी पेंटिंग बनाने का बड़ा ऑर्डर तक मिल गया. वह भूला नहीं कि बीच में गैलरी ने कितना माल काटा होगा. उसे इतना माल जरुर मिला कि उसके बाद पलट कर अभाव का मुंह नहीं देखा. अब वह स्वतंत्र पेंटर था जो अपनी शर्तो पर पेंटिंग बनाता और बेचता था. बडी गैलरी से करार था जो उसकी पेंटिंग रिजनेबल दामों में ले लिया करती. वह धनधान्य से भरपूर था और परिवार भी मस्त. अपने स्पेस की चाहत भी पूरी हो गई थी.
कमी थी तो बस एक अदद प्रेमिका की। जो हर साधन संपन्न, नवधनाढ़य वर्ग के अधेड़ावस्था की तरफ बढ़ते मर्दों की होती है। कलाकार हो तो प्रेरणा अनिवार्य शर्त है जो प्रकृति और स्त्री दोनों के सान्निध्य से ही मिलती है। खुली छत पर ढेर सारे गमलों में हरे भरे पौधे उगा रखे हैं, लेकिन यह सचमुच की प्रकृति तो नहीं। प्रकृति का छायाएं हैं। स्त्री का साथ घर में भी है पर उसकी प्रेरणा एक्सपायर हो चुकी है। वैसे भी कलाकार आलोक की नजर में घर की स्त्री गमलो में उगे पौधों की तरह होती है जो हरियाली का भ्रम देती है, छाया नहीं। उसे सघन छाया की नए सिरे से तलाश थी। किस्मत से वह करीब आ रही थी। उस खुली छत पर अब दो स्टुडियों आबाद थे। उस गली में और भी कलाकार थे, पर किसी के पास इतनी खुली जगह कहां। नए बसी कालोनी में मकान के मामले में भी आलोक ने बाजी मार ली थी।  एक और बाजी उसके बेहद करीब आ चुकी थी। उसे बस अपने को बाजी के लिए तैयार करना था।
शाम को आलोक अपने स्टुडियों में साजो सामान समेत जम गया। सामने वाले स्टुडियो में बहार पहले से जमी ही थी। उसका मन पेंट करने में नहीं रम रहा था। बार बार उसका मन होता कि वह उसके स्टुडियों में झांक कर आए कि वह क्या कर रही है। अभी तक उसका पूरा काम देखा नहीं था। स्टुडियों में पेंटिंग रखवाते समय जरुर उसने महसूस किया कि वह बड़ी साइज की पेंटिंग बनाती है और जो थोड़ी भारी वजन की थी। पता नहीं क्यों भारी थी। वह बस अनुमान लगा सकता था। उसका संसार देखने के मन हो रहा था। एक बार संसार देख ले फिर बातचीत शुरु की जा सकती है। सहज दोस्ताना बने तो दोनों साथ साथ आर्ट गैलरीज में प्रदर्शनी देखने जा सकते हैं। वह शहर में नई है, उसे महानगर में जमने के, बिकने के थोड़े हुनर सीखा सकता है। वह उधेड़बुन में था कि सामने से थकी हारी , उलझी हुई सी बहार चली आ रही थी। उसका चित्त प्रसन्न हो गया।
हाय…कैसे हो। चाय मिलेगी…मैं धीरे धीरे स्टुडियों में सारा इंतजाम कर लूंगी..फिलहाल आपकी पत्नी के हाथ की बनी चाय मिल जाए तो जन्म सफल हो जाए।
आलोक उसकी इस बेतकुल्लफी पर फिदा हो गया। जमेगी इनके साथ। सामाजिक लग रही हैं।
हां हां क्यों नहीं…माई प्लेजर मैम…बिहसंता हुए आलोक ने घंटी बजाई। थोड़ी देर में आलोक की पत्नी नीना दौड़ती हुई उपर आई। तीनों ने एक साथ चाय पी। आलोक चाहता था कि नीना चाय देकर नीचे चली जाए। नीना टलने का नाम ही नहीं ले रही थी। थोड़ी ही देर में बहार और नीना आपस में इतने घुलमिल कर बातें करने लगे कि आलोक को लगा, वह इन दोनों के बीच अचानक अप्रासंगिक हो गया है।
दोनों को नजदीक आने से थोड़ा खुश भी हुआ पर संशकित भी। दोनों आपस में सहेलियां बन गईं तो उसकी दाल नहीं गलेगी। उसे अरहर दाल की बढ़ती कीमतो से ज्यादा अपनी दाल को लेकर चिंता हो रही थी। वैसे भी नीना दाल गलाने में माहिर। मुरादाबादी जो थी। किसी भी तरह के दाल को पका कर चाट की तरह कटोरियों में पेश कर देती थी। वह कई बार चिढ़ जाता था। दाल की चाट…। नीना परोसते समय दाल की चाट का ऐतिहासिक महत्व बताना नहीं भूलती…जिसे उसके कान ने आज तक नहीं सुनना चाहा।
उसे नीना से ही खतरा महसूस हुआ जो उसके अरमानों पर पानी फेर सकती थी। मन को बहुत समझाया कि शाम को नीना कहां होती है घर पर। देर शाम आएगी। तह तक का समय उसका। मैनेज कर लेगा। नीना के शोज आने वाले हैं, उसी में उलझ जाएगी। दिल को बहलाता हुआ वह अपने कैनवस पर खो गया।
नीना से बहार की हाय हैल्लो रोज की बात हो गई थी। नीना मंडी हाउस जाते समय छत पर आकर बहार को हैल्लो करना नहीं भूलती। बाद में अति व्यस्त होती चली गई तो यह सिलसिला भी खत्म हो गया। सब अपने काम में डूब गए। बहार का ज्यादा समय आलोक के साथ बीतने लगा। आलोक को बहार की सबसे अच्छी बात लगी कि वह वोदका पी लेती है। बस क्या था। व्हिस्की की जगह वोदका ने ले ली। रोज वोदका सेवन शुऱु। फ्रीज में बर्फ जमाने की जिम्मेदारी खुद आलोक ने ले ली। नीना एकाध बार चकित होकर देखती कि इतनी तत्परता से आलोक बर्फ कभी नहीं जमाता था। अब ट्रे में पानी भर कर खुद रखने लगा है। उसे छत पर जाने का समय भी नहीं मिला। कई दिन हो गए थे बहार से हाय हैल्लो किए हुए। उसने आलोक से ही पूछ लिया..वह फटाक से जवाब देता जैसे बहार ने उसे प्रवक्ता नियुक्त कर रखा हो। बहार के शोज के बारे में, बहार के लिए गैलरी बुक करवाने का जिम्मा, गेस्ट का जिम्मा, बायर्स की लिस्ट…सब आलोक उससे शेयर करने को तत्पर। यहां तक कि बहार कैनवस पर जो मेटेरियल यूज करती थी, जिससे उसकी पेंटिंग भारी हो जाती थी, उसका इंतजाम भी आलोक के जिम्मे। आलोक के दिन गदगद चल रहे थे। बस बहार तक उसकी भावनाएं खुल कर नहीं पहुंच पा रही थीं। सीधे सीधे क्या कहता। एक ही फील्ड के लोग। सहजता से घटित हो तो सुंदरता बनी रहती है, आलोक सोचता और बहार से कुछ कहते कहते रुक जाता। बहार रोज नीना के बारे में जरुर बात करती। जैसे क्या करती है, किस किस नाटक में, कैसी भूमिकाएं की। कहां मिली..कैसी है, उसे क्या क्या पसंद है। उसकी दोस्त हैं या नहीं..। ऊपर आज कल क्यों नहीं आती…आदि आदि ढेरो सवाल। कई बार वह खीझ जाता। नीना को फोन करके कह देता-भई, कोई आपको मिस कर रहा है, बात कर लें आप।
बहार उसे शाम के वोदका सेशन के लिए आमंत्रित करना चाहती थी। नीना उपलब्ध नहीं थी, उसे अपना नाटय ग्रुप के साथ असम के दौरे पर जाना पड़ा। आलोक ने चैन की सांस ली। वह बहार से कुल कर फ्लर्ट कर सकता था। कोई रोकटोक नहीं, कोई भय नहीं..खुल कर अपनी बात कह सकता था। बहार बुरी तरह रिएक्ट करना चाहे तो भी किसी का भय नहीं. यह मुफीद मौका है, अपनी बात कह देने का। उसने नीना और ईश्वर दोनों को इस सुअवसर के लिए धन्यवाद दिया।
शाम को वोदका सेशन पर आलोक ने घुमा फिरा कर बातें छेड़ी। बहार ने समझा, वह चुहल कर रहा है। वह मजे लेने लगी। आलोक को छेड़ती रही। आलोक की दाल की हांडी खदक रही थी। यह रोज का क्रम हो गया। नीना के लौटने तक दोनों और करीब आ गए थे। दोनों को ये अहसास नहीं था कि बगल की बहुमंजिली इमारत की बालकनी से कोई उनकी चुहल पर गौर फरमा रहा है। जो देख रहा था, यूं कहे, देख रही थी, उसे मालूम था कि नीना शहर से बाहर गई हुई है। वहां किस्से बुने जा रहे थे।
नीना लौट कर आ गई। उसके आते ही जैसे धमाका-सा हुआ। वह मीन माइंडेड नहीं थी। इसीलिए आलोक और बहार की निकटता से उसे कोई समस्या नहीं थी। वह दोनों की निकटता को प्रोफेशनल निगाह से देखती थी। उसके पीछे क्या गुल खिला है, इसका अंदेशा तक नहीं था उसे। नीना ने उसी शाम घर में फोड़ दिया। आलोक हतप्रभ रह गया। उसे लगा, नीना ने कोई कांड किया तो वीराना आते देर नहीं लगेगी। बहार हासिल नहीं तो क्या हुआ, बहार सामने तो है। नीना ने फरमान जारी कर दिया कि वो लड़की कहीं और स्टुडियों बना ले। यह घर खाली करना पड़ेगा। उस शाम नीना ने क्या क्या नहीं कहा। आलोक हक्का बक्का सुनता रहा। वह चाहता तो डटकर मुकाबला कर सकता था पर किसके सहारे करे। बहार का माइंड वह समझ नहीं पाया था। नीना दोनों को गलत समझ रही है। उसे अफसोस इसी बात का कि नीना का इल्जाम सही नहीं है। सही होता तो हर जुल्म सितम सह लेता। कोई न कोई रास्ता निकालता। बहार को किसी दोस्त की छत पर स्टुडियो दिलवा देता। लेकिन अब बहार उसके हाथ से निकल जाएगी, कहां जाएगी पता नहीं। कितना कायर समझेगी उसको जो अपनी बीवी से डर गया। किस बात का कलाकार। उसे इतनी फ्रीडम नहीं। गुस्से में दनदनाता हुआ वह ऊपर गया। बहार के हाथ गीले थे। प्लास्टर आफ पेरिस के सफेद गोले बना रही थी। कैनवस पर उभार के लिए चिपकाने वाली थी, आलोक को ऐसा लगा।
उसका माथा इतना भिन्नाया हुआ था कि लगा, उसी गोले से अपना सिर फोड़ ले या नीना का फोड़ दे। सारे कैनवस पर प्लास्टर फेर दे। बहार उसके हाथ से निकलने वाली है। पहले की तरह वीरानी से भर जाएगा वह। सुख के दिन इतने कम क्यों होते हैं, सोचते ही हलक सूख गया।
मैम…मेरी पत्नी को शक है कि हमारे बीच कुछ चल रहा है। उसे किसी ने कंपलेन कर दिया है। वह बहुत गुस्से में हैं और वह चाहती है कि….
बहार के हाथ रुक गए। मग में हाथ डाल कर धो लिया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया. मानो कोई नई या अनहोनी बात न हो। या वह इस तरह के आरोपो की आदी रही हो।
आलोक को लगा, वह चीखेगी, खंडन करेगी, नीना को भला बुरा कहेगी या कुछ भी रिएक्शन हो सकता था। कलाकार भी तो सामान्य इनसान ही होते हैं।
आप नीना को बुलाइए…मैं उनसे कुछ कहना चाहती हूं…
नीना वहां धमक चुकी थी। वह तमतमा रही थी। उसका बस चलता तो बहार को हाथ पकड़ कर बाहर कर देती।
नीना का गुस्सा देख आलोक दूसरी तरफ घूम गया। बहार और नीना आमने सामने।
नीना…
तुमने सोचा कभी कि मैंने एक पुरुष के साथ स्टुडियो साझा क्यों किया। एक अकेली लड़की इतना साहस कैसे कर गई। मुझे बहुत मिलते रहे हैं ऐसे जगहो के न्योते। मैं यहां आई, जहां कोई स्त्री हो। मुझे तुम्हारे पति में रत्ती भर दिलचस्पी नहीं। सच कहूं तो मुझे मर्दो के साथ अकेले काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती। होत है तो….कुछ पल के लिए रुकी।  
उसका स्वर शांत, उत्तेजनारहित था। आलोक उसके इस अदा पर भी फिदा हो रहा था।
सुनो…मेरी दिलचस्पी नीना में है। नीना….समझ गई न। आई एम इंटेरेस्टेड इन यू । ओनली वीमेन, नो मेन इन माई लाइफ। मैं तुम्हारी तरफ हाथ बढ़ाना चाहती हूं…वांट टू बी अ रिलेशनशीप विद यू।
बहार अपना हाथ छोटे तौलिए से पोंछ रही थी। चेहरे पर सुकून की छाया। सच बोलने के साहस की रेखाएं चमक रही थीं।
आलोक को लगा बिजली के सारे तार टूट कर उसकी छत पर आ गिरे हैं और सारे कैनवस पर चिंगारियां बरस रही हैं। वह चौतरफा तारो से घिर गया है। उसे कुछ दिखाई देना बंद हो गया है। प्लास्टर के गोले हवा में उड़ रहे थे।
…….

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