Meritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve Kampanyalarİzmit Escort BayanMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor BahisleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir MiMeritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot Oyunları, Marsbahis Spor BahisleriMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve Kampanyalar, Mavibet Giriş AdresiMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor BahisleriMeritking Giriş: Meritking Giriş Adresi, Meritking Mobilden Giriş 2026Marsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMarsbahis Giriş: Marsbahis Spor Bahisleri, Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Giriş Adresi, Mavibet Mobilden Giriş 2026Meritking Giriş: Meritking Canlı Destek Ve İletişimMarsbahis Giriş: Marsbahis Casino Ve Slot OyunlarıMavibet Giriş: Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir MiMavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Giriş AdresiMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Bonus Ve KampanyalarMavibet Giriş: Mavibet Spor Bahisleri, Mavibet Casino Ve Slot OyunlarıMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Spor Bahisleri, Meritking Casino Ve Slot OyunlarıMarsbahis Giriş: Marsbahis Para Yatırma Ve Çekme İşlemleriMavibet Giriş: Mavibet Güvenilir Mi, Mavibet Bonus Ve KampanyalarMeritking Giriş: Meritking Güvenilir Mi, Meritking Bonus Ve KampanyalarMarsbahis Giriş: Marsbahis Giriş Adresi, Marsbahis Mobilden Giriş 2026Mavibet Giriş: Mavibet Spor Bahislerimasterbetttingmasterbettting girişmasterbetttingromabetromabet girişromabetroketbetroketbet girişroketbetbetkolikbetkolik girişbetkolikrinabetrinabet girişrinabetkulisbetkulisbet girişkulisbetbahiscasinobahiscasino girişbahiscasinosonbahissonbahis girişsonbahisenbetenbet girişenbetbetasusbetasus girişbetasusenjoybetenjoybet girişenjoybetpashagamingpashagaming girişpashagaminggrandbettinggrandbetting girişgrandbettingpusulabetpusulabet girişpusulabetbetsilinbetsilin girişbetsilinromabetromabet girişromabetbetciobetcio girişbetciogalabetgalabet girişgalabetbetkanyonbetkanyon girişbetkanyonamgbahisamgbahis girişamgbahismatbetmatbet girişmatbetmavibetmavibet girişmavibetbetzulabetzula girişbetzularoketbetroketbet girişroketbetbetkolikbetkolik girişbetkolikrinabetrinabet girişrinabetbetnanobetnano girişbetnanoavrupabetavrupabet girişavrupabetbahiscasinobahiscasino girişbahiscasinomasterbettingmasterbetting girişmasterbettingkulisbetkulisbet girişkulisbetroketbetroketbet girişroketbetbetkolikbetkolik girişbetkolikromabetromabet girişromabetbahiscasinobahiscasino girişbahiscasinosonbahissonbahis girişsonbahisenbetenbet girişenbetbetasusbetasus girişbetasusbetkanyonbetkanyon girişbetkanyonrinabetrinabet girişrinabetİbizabetİbizabet girişİbizabetRestbetRestbet girişRestbetMavibetMavibet girişMavibetBetplayBetplay girişBetplayBetpuanBetpuan girişBetpuanBetbigoBetbigo girişBetbigoAresbetAresbet girişAresbetXslotXslot girişXslotAvrupabetAvrupabet girişAvrupabetBetyapBetyap girişBetyapSonbahisSonbahis girişSonbahisBetboxBetbox girişBetboxextrabetextrabetMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMarsbahisMarsbahis girişMarsbahisMeritkingMeritking girişMeritkingMeritkingMeritking girişMeritkingMeritkingMeritking girişMeritkingHoliganbetHoliganbet girişHoliganbetHoliganbetHoliganbet girişHoliganbetHoliganbetHoliganbet girişHoliganbetAlobetAlobet girişAlobetAlobetAlobet girişAlobetBetzulaBetzula girişBetzulaBetzulaBetzula girişBetzulaRoketbetRoketbet girişRoketbetRoketbetRoketbet girişAmgbahisAmgbahis girişAmgbahisJokerbetJokerbet girişJokerbetJokerbetJokerbet girişJokerbetAresbetAresbet girişAresbetRoketbetRoketbet girişRoketbetAresbetAresbet girişBetraBetra girişBetraBetraBetra girişBetraGalabetGalabet girişGalabetGalabetGalabet girişGalabetRomabetRomabet girişRomabetRomabetRomabet girişRomabetMavibetMavibet girişMavibetMavibetMavibet girişMavibetAtlasbetAtlasbet girişAtlasbetAresbetAresbet girişAresbetBetkolikBetkolik girişBetkolikAvrupabetAvrupabet girişAvrupabetAvrupabetAvrupabet girişAvrupabetKulisbetKulisbet girişKulisbetKulisbetKulisbet girişKulisbetBahiscasinoBahiscasino girişBahiscasinoBahiscasinoBahiscasino girişGrandbettingGrandbetting girişGrandbettingPashagamingPashagaming girişPashagamingSonbahisSonbahis girişBahiscasinoBahiscasino girişBahiscasinoSonbahisSonbahis girişSonbahis

मीडिया से राडिया तक


प्रसिद्ध पत्रकार-मीडिया विश्लेषक दिलीप मंडलजी का यह लेख ‘पाखी’ के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित हुआ है. लेख इतना अच्छा और ज़रूरी लगा कि सोचा आपसे साझा किया जाए. हम दिलीपजी के आभारी हैं कि उन्होंने लेख के शीर्षक में किंचित बदलाव के साथ हमें प्रकाशित करने की अनुमति दी- जानकी पुल.




यह छवियों के विखंडन का दौर है। एक सिलसिला सा चल रहा है, इसलिए कोई मूर्ति गिरती है तो अब शोर कम होता है। इसके बावजूद, 2010 में भारतीय मीडिया की छवि जिस तरह खंडित हुई, उसने दुनिया और दुनिया के साथ सब कुछ खत्म होने की भविष्यवाणियां करने वालों को भी चौंकाया होगा। 2010 को भारतीय पत्रकारिता की छवि में आमूल बदलाव के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा। देखते ही देखते ऐसा हुआ कि पत्रकार सम्मानित नहीं रहे। वह बहुत पुरानी बात तो नहीं है जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। लेकिन आज कोई यह बात नहीं कह रहा है। कोई यह बात कह भी रहा है तो उसे पोंगापंथी करार दिया जा सकता है।

मीडिया का स्वरूप पिछले दो दशक में काफी बदल गया है। मीडिया देखते ही देखते चौथे खंभे की जगह, कुछ और बन गया। वह बाकी धंधों की तरह एक और धंधा बन गया। मीडिया को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ जोड़ दिया गया और पता चला कि भारत में यह उद्योग 58,700 करोड़ रुपए का है।[i] अखबार और चैनल चलाने वाली कंपनियों का सालाना कारोबार देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपए का हो गया। मुनाफा कमाना और मुनाफा बढ़ाना मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य बन गया। मीडिया को साल में विज्ञापनों के तौर पर साल में जितनी रकम मिलने लगी, वह कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है।[ii]

पर यह सब 2010 में नहीं हुआ। कुछ मीडिया विश्लेषक काफी समय से यह कहते रहे हैं कि भारतीय मीडिया का कॉरपोरेटीकरण हो गया है और अब उसमें यह क्षमता नहीं है कि वह लोककल्याणकारी भूमिका निभाए। भारत में उदारीकरण के साथ मीडिया के कॉरपोरेट बनने की प्रक्रिया तेज हो गई और अब यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ट्रस्ट संचालित द ट्रिब्यून के अलावा देश का हर मीडिया समूह कॉरपोरेट नियंत्रण में है। पश्चिम के मीडिया के संदर्भ में चोमस्की, मैकचेस्नी, एडवर्ड एस हरमन, जेम्स करेन, मैक्वेल, पिल्गर और कई अन्य लोग यह बात कहते रहे हैं कि मीडिया अब कॉरपोरेट हो चुका है।

मीडिया का कारोबार बन जाना दर्शकों और पाठकों के लिए चौंकाने वाली बात हो सकती है, लेकिन जो लोग भी इस कारोबार के अंदर हैं या इस पर जिनकी नजर है, वे जानते हैं कि मीडिया की आंतरिक संरचना और उसका वास्तविक चेहरा कैसा है। लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका निभाने की अब मीडिया से उम्मीद भी नहीं है। चुनावों में मीडिया जनमत को प्रभावशाली शक्तियों और सत्ता के पक्ष में मोड़ने का काम करता है और इसके लिए वह पैसे भी वसूलता है।[iii] हाल के चुनावों में देखा गया कि अखबार और चैनल प्रचार सुनिश्चित करने के बदले में रेट कार्ड लेकर उम्मीदवारों और पार्टियों के बीच पहुंच गए और उसने खुलकर सौदे किए। मीडिया कवरेज के बदले कंपनियों से भी पैसे लेता है और नेताओं से भी। जब वह पैसे नहीं लेता है तो विज्ञापन लेता है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार विज्ञापन के बदले पैसे नहीं लेते, बल्कि कंपनियों की हिस्सेदारी ले लेते हैं। इसे प्राइवेट ट्रिटी का नाम दिया गया है। मीडिया कई बार सस्ती जमीन और उपकरणों के आयात में ड्यूटी की छूट भी लेता है।
मीडिया हर तरह की कारोबारी आजादी चाहता है और किसी तरह का सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं निभाता, लेकिन 2008-09 की मंदी के समय वह खुद को लोकतंत्र की आवाज बताकर सरकार से राहत पैकेज लेता है। मंदी के नाम पर मीडिया को बढ़ी हुई दर पर सरकारी विज्ञापन मिले और अखबारी कागज के आयात में ड्यूटी में छूट भी मिली। लेकिन यह नई बात नहीं है। यह सब 2010 से पहले से चल रहा था।

2010 में एक नई बात हुई। इस साल भारतीय मीडिया का एक नया रूप लोगों ने देखा। वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस की मालकिन नीरा राडिया दिल्ली की अकेली कॉरपोरेट दलाल या लॉबिइस्ट नहीं हैं। ऐसे कॉरपोरेट दलाल देश और देश की राजधानी में कई हैं। 2009 इनकम टैक्स विभाग ने नीरा राडिया के फोन टैप किए थे, जो लीक होकर बाहर आ गए। नीरा राडिया इन टेप में मंत्रियों, नेताओं, अफसरों और अपने कर्मचारियों के साथ ही मीडियाकर्मियों से भी बात करती सुनाई देती हैं।

इन टेप को दरअसल देश में राजनीतिशास्त्र, जनसंचार, अर्थशास्त्र, मैनेजमेंट, कानून आदि के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इन विषयों को सैकड़ों किताबे पढ़कर जितना समझा सकता है, उससे ज्यादा ज्ञान राडिया के टेपों में है। मिसाल के तौर पर, राजनीतिशास्त्र की किताबें बताती हैं कि कैबिनेट का गठन प्रधानमंत्री करता है। संविधान में भी ऐसा ही लिखा है। लेकिन राडिया टेपों को सुनकर आप जान सकते हैं कि भारत में कैबिनेट के गठन में बड़े कॉरपोरेट समूहों की कितनी अहम भूमिका होती है। देश के ज्यादातर मंत्रियों, खासकर आर्थिक मंत्रालयों से जुड़े मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री नहीं, कंपनियां करती हैं। इसी तरह नौकरशाही भी किस तरह काम करती है, इसे समझने के लिए राडिया के टेपों को सुनना उपयोगी है। राडिया के टेप यह भी बताते हैं कि न्यायपालिका के फैसले हमेशा तर्क-वितर्क और सबूतों से तय नहीं होते। वे फिक्सभी होते हैं। [iv]

इसी तरह राडिया टेप ने मीडिया की आंतरिक संरचना और कार्यप्रणाली को खोलकर रख दिया है। भारत में पत्रकारिता के किसी भी स्कूल में मीडिया को इस तरह नहीं पढ़ाया जाता है। राडिया के टेप सुनकर देश के लोगों को पहली बार पता चला कि टीवी स्क्रीन पर नीति और नैतिकता की बात करने वाले असल जिंदगी में क्या-क्या करते हैं। राडिया टेप से यह पता चला कि अखबारों की हेडलाइंस हमेशा संपादक और संपादकीय विभाग के लोग तय नहीं करते। कोई नीरा राडिया भी है, जो बताती है कि देश की सबसे बड़ी खबर क्या है और उसे किस तरह लिखा जाना चाहिए। मीडिया में गेटकीपिंग सिद्धांत में पढ़ाया जाता है कि न्यूज रूम और संपादकीय विभाग में खबरों के गेटकीपर होते हैं। नीरा राडिया ने पूरे देश को और खास तौर पर पत्रकारिता के शिक्षकों और विद्यार्थियों को बताया कि सिलेबस बदलने की जरुरत है क्योंकि गेटकीपिंग का सच यह नहीं है। गेटकीपर कई बार न्यूजरूम से बाहर होते हैं। राडिया जैसे गेटकीपर कई बार खबरें छपने देते हैं और कई बार खबरें रोक लेते हैं। राडिया टेप सामने न आते तो शायद ही कभी पता चल पाता कि एक न्यूज चैनल – न्यूज एक्स में काम करने वाले पत्रकारों और अन्य कर्मियों के पैसे नीरा राडिया देती हैं।[v]

राडिया टेप कांड में आप पाएंगे कि नीरा राडिया सिर्फ पत्रकारों से बात नहीं करती हैं। बातचीत के दौरान वे एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय का जिक्र करती हैं तो कभी टीवी18 समूह के राधव बहल और समीर मनचंदा का, तो कभी वे टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के मालिक विनीत जैन का। एक टेप में राडिया राजदीप सरदेसाई से यह कहती हैं कि वे मुकेश अंबानी समूह के एक प्रमुख व्यक्ति मनोज मोदी के साथ उनकी कंपनी के मालिक राघव बहल से मिलने नोएडा आ रही हैं। राजदीप भी उन्हें अपनी कंपनी के मैनेजमेंट से जुड़े एक व्यक्ति समीर मनचंदा से मिलने को कहते हैं। (आउटलुक की साइट पर आप इस बातचीत का ट्रांसस्क्रिप्ट पढ़ सकते हैं)।[vi] जाहिर है कॉरपोरेट दलाल मीडिया समूहों के मालिकों और प्रबंधन से सीधा संवाद भी रखते हैं। ऐसे में पत्रकारों को काम करने की कितनी स्वतंत्रता होगी, इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं है।

नीरा राडिया के टेप इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय मीडिया अब कॉरपोरेट के हाथों में न सिर्फ खेल रहा है बल्कि उसका हिस्सा बन चुका है। नीरा राडिया और ऐसे ही दलाल न सिर्फ यह बता रहे हैं कि क्या छपना है और क्या नहीं छापना है, बल्कि वे यह भी तय कर रहे हैं कि कौन सा रिपोर्टर कौन सी खबर लिखेगा। वे खबरों का नजरिया तक तय कर रहे हैं। वे खबरों का सौदा कर रहे हैं और बात नहीं मानने वालों को दंडित करने की धौंस दिखा रहे हैं। संपादक राडिया को बताते हैं कि किस खबर का कैसा कवरेज किया जा रहा है। राडिया संपादकों को बताती हैं कि किस नेता से क्या बात करनी है और संपादक ऐसा करने के बाद राडिया को इसकी सूचना देते हैं। वीर सांघवी जैसे बड़े माने जाने वाले पत्रकार अपने कॉलम में शब्दश: वही लिखते हैं, जो राडिया के साथ बातचीत में तय होता है।[vii]

कॉरपोरेट दलाल अपने काम के दौरान मीडिया में छपने और दिखाई जाने वाली सामग्री के प्रबंधन को जितना महत्व देते हैं, उससे इस बात का एहसास होता है कि मीडिया की ताकत कितनी जबर्दस्त है। मीडिया में एक हेडलाइन के गलत छपने या जरूरी मानी गई किसी खबर के कम महत्व के साथ छापे या दिखाए जाने को लेकर नीरा राडिया जिस तरह चिंतित और नाराज होती हैं, उससे मीडिया के महत्व को समझा जा सकता है।

वह पुरानी बात हो गई जब मीडिया में कुछ भी छपने से किसी को फर्क नहीं पड़ने की बात की जाती थी। दूरदर्शन पर दिखाए जाने वालसे कार्यक्रम आज तक के वर्ष 2000 में 24 घंटे के चैनल बनने के साथ ही टेलीविजन न्यूज चैनलों के क्षेत्र में एक बड़े विस्फोट की शुरुआत हुई। लगभग 10 साल बाद, 2010 में देश में 512 चैनलों को प्रसारण करने की इजाजत हासिल हैं। देश में 461 टीवी चैनलों से प्रसारण होता है जबकि 2008 में 389 चैनलों से ही प्रसारण होता था। इससे भारत में टीवी के विस्तार की रफ्तार का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश में टेलीविजन के लगभग 50 करोड़ दर्शक हैं, जबकि समाचार पत्रों के कुल पाठकों की संख्या 35 करोड़ है। पांच साल पहले देश के 50 फीसदी घरों में टेलीविजन देखा जाता था। 2010 में ऐसे घरों की संख्या 60 फीसदी तक पहुंच गई।[viii]

यानी अब देश की बहुत बड़ी आबादी मीडिया कवरेज के दायरे में है। मीडिया अब पहले की तरह निरीह और लाचार नहीं रहा, जब नेता उसका मजाक उड़ाया करते थे। अब वह देश की सबसे ताकतवार संस्थाओं में से एक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व चेयरमैन जस्टिस पी बी सावंत के मुताबिक न्यायपालिका के बाद संभवत: यह समाज की सबसे ताकतवर संस्था है।[ix] जस्टिस सावंत की राय में मीडिया ताकतवर तो हो गया है लेकिन इसका संचालन पैसे वालों के हाथों में होने के कारण इसमें कई गड़बड़ियां भी हैं और इसकी कई सीमाएं भी हैं। उनका मानना है कि मीडिया के स्वामित्व की संरचना को देखते हुए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नीचे से लेकर ऊपर तक प्रशासन हमेशा आर्थिक रूप से ताकतवर के पक्ष में झुका होता है।
राडिया कांड मीडिया की ताकत और उसकी खामी दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताकत इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और खामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता। मीडिया को पैसे वाले पैसा कमाने के लिए और ताकत के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की संभावना इसकी संरचना और स्वामित्व के ढांचे में ही दर्ज है। राडिया कांड से यह जगजाहिर हो गया कि खासकर ऊंचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज हुई है। कुछ संपादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों तक को कंपनी के शेयर दिए जाते हैं। इस तरह उनकी प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसंद का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्जी से ईमानदार नहीं रह सकता।

क्या उम्मीद की कोई किरण है?
ऐसे समय में जब मीडिया पर भरोसा करना आसान नहीं रहा (अमेरिकी मीडिया के बारे में एक ताजा सर्वे यह बताता है कि वहां 63 फीसदी पाठक और दर्शक यह मानते हैं कि मीडिया भरोसे के काबिल नहीं है[x]) तब लोग क्या करें? यह मुश्किल समय है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस दौर में नागरिक पत्रकारिता का एक नया चलन भी जोर पकड़ रहा है। हो सकता है कि मुख्यधारा की कॉरपोरेट पत्रकारिता इसके असर में खुद को बदलने के लिए मजबूर हो जाए (मेरी निजी राय में ऐसा संभव नहीं है)। नागरिक और वैकल्पिक पत्रकारिता ने राडिया कांड और विकिलीक्स के मामले में सबको चौंकाया है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया-कॉरपोरेट और नेताओं के रिश्तों के बारे में अखबारों, पत्रिकाओं और चैनलों पर खबर आने से पहले ही राडिया कांड राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ चुका था। मास मीडिया को लेकर बहुचर्चित और प्रशंसित -एजेंडा सेटिंग थ्योरी- यह कहती है कि मीडिया किसी मुद्दे पर सोचने के तरीके पर हो सकता है कि निर्णायक असर न डाल पाए लेकिन किन मुद्दों पर सोचना है यह मीडिया काफी हद तक तय कर देता है।[xi] तो राडिया-मीडिया कांड में ऐसा कैसे हुआ कि मीडिया में कोई बात आए, उससे पहले ही वह बात लोकविमर्श में आ गई। नीरा राडिया के बारे में मुख्यधारा के मीडिया में पहला लिखा हुआ शब्द ओपन मैगजीन ने छापा।[xii] टीवी पर इस बारे में पहला कार्यक्रम इसके बाद सीएनबीसी पर हुआ, जिसे करण थापर ने एंकर किया। इसके बाद द हिंदू ने इस बारे में पहले संपादकीय पन्ने पर और बाद में समाचारों के पन्ने पर सामग्री छापी। आउटलुक ने इस बारे में कई ऐसे तथ्य सामने लाए जिनका ओपन ने भी खुलासा नहीं किया था। मेल टुडे और इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस बारे में छापा। हिंदी मीडिया की बात करें तो दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में दो पेज की सामग्री छापी गई। एनडीटीवी ने बरखा दत्त को सफाई का मौका देने के लिए 47 मिनट का एक कार्यक्रम किया (एक घंटे का कार्यक्रम 13 मिनट पहले ही अचानक समेट दिया गया)। इससे पहले तक, जब मुख्यधारा के मीडिया में कोई भी राडिया-बरखा-वीर-चावला कांड को नहीं छाप/दिखा रहा था तो लोगों को इसकी खबर कैसे हो गई और यह मुद्दा चर्चा में कैसे आ गया?

यह संभव हुआ इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की सक्रियता की वजह से। जब कॉरपोरेट मीडिया राडिया कांड के बारे में कुछ भी नहीं बता रहा था तो लोग इंटरनेट पर पत्रकारिता कर रहे थे और इस कांड से जुडी सूचनाएं एक दूसरे तक पहुंचा रहे थे। फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, यूट्यूब आदि मंचों पर यह पत्रकारिता हुई। यह पत्रकारिता उन लोगों ने की जिन्होंने शायद कभी भी पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन जो किसी मसले को महत्वपूर्ण मान रहे थे और उससे जुड़ी सूचनाएं और लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। यह नागरिक पत्रकारिता है। इसमें कोई गेटकीपर नहीं होता।

नागरिक पत्रकारिता ने दरअसल पत्रकारिता की विधा को लोकतांत्रिक बनाया है। इसमें पढ़ने या देखना वाला यानी संचार सामग्री का उपभोक्ता, सक्रिय भूमिका निभाने लगता है। पत्रकारिता के तिलिस्म को तोड़ने में इसकी बड़ी भूमिका है। आज एक व्यक्ति बिना किसी पत्रकारीय प्रशिक्षण के, 10 रुपए खर्च करके साइबर कैफे में बैठकर या अपने घर से एक ब्लॉग लिख सकता है और दुनिया भर में पहुंच सकता है। या फिर वह फेसबुक पर अपनी बात कह सकता है और हजारों लोग उसे पढ़ सकते हैं। ट्विटर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए आज अपनी बात पहुंचाना पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है। जो बात मुख्यधारा में नहीं कही जा सकती, वह इन माध्यमों के जरिए कही जा सकती है। परंपरागत पत्रकारिता के भारी तामझाम और खर्च से अलग यह नई पत्रकारिता है।

पश्चिमी देशों में नई मीडिया की ताकत टेक्नोलॉजी के विस्तार की वजह से बहुत अधिक है। लेकिन भारत में भी इसकी ताकत बढ़ रही है। गूगल के अनुमान के मुताबिक, भारत में इस समय इंटरनेट के 10 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता है।[xiii] चीन के 30 करोड़ और अमेरिका के 20.7 करोड़ की तुलना में यह संख्या छोटी जरूर है, लेकिन भारत इस समय इंटरनेट के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) के दिसंबर 2010 में जारी किए गए आंकड़ों (ये आंकड़े सितंबर, 2010 तक के हैं) के मुताबिक तेज रफ्तार इंटरनेट यानी ब्रॉडबैंड के ग्राहकों की संख्या एक करोड़ को पार कर गई है। अगस्त से सितंबर के बीच एक महीने में देश में 2 लाख, 10 हजार नए ब्रॉडबैंड कनेक्शन लिए गए।[xiv] इंटरनेट पर आने जाने वालों का लेखा-जोखा रखने वाली दुनिया की प्रमुख संस्था कॉमस्कोर ने 2009 में किए गए अध्ययन के आधार पर बताया कि भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 44 फीसदी लोग समाचार साइट पर भी जाते हैं। 15 साल से ज्यादा उम्र के डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग अक्टूबर महीने में समाचारों की वेबसाइट पर गए। एक साल में यह संख्या 37 फीसदी बढ़ी है।[xv] सोशल नेटवर्किंग साइट की लोकप्रियता भी भारत में बढ़ी है। फेसबुक के यूजर की संख्या भारत में दो करोड़ को पार कर गई है।[xvi]

इन आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट के फैलाव के मामले में भारत तेजी से दुनिया के विकसित देशों की ओर बढ़ रहा है। इसके आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नागरिक पत्रकारिता का असर यहां भी बढ़ेगा। मुख्यधारा में जगह न मिलने वाले समाचारों को इन वैकल्पिक माध्यमों में जगह मिलेगी। मुख्यधारा के मीडिया से अलग रह गए समुदायों के लिए भी यह वैकल्पिक मंच बनेगा। ऐसा होने लगा है। यह सही है कि ऐसा पहले शहरी क्षेत्रों में होगा और कम आय वर्ग वाले शुरुआती दौर में इस पूरी प्रक्रिया से बाहर रहेंगे। इसके बावजूद संचार माध्यमों में लोकतंत्र मजबूत होगा। प्रेस और चैनल की तुलना में यह कम खर्चीला माध्यम है।

इस तरह के वैकल्पिक माध्यमों को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। इस माध्यम की बढ़ती ताकत के साथ ही इंटरनेट पर कॉरपोरेट क्षेत्र का दखल भी बढ़ रहा है। ज्यादा संसाधनों के जरिए वे छोटे मंचों और नागरिक पत्रकारिता करने वालों की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे। प्रतिरोध को वे अपने दायरे में समेटने की कोशिश भी करेंगे। विकिलीक्स के मामले में दुनिया ने देखा कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों ने किस तरह सूचनाओं और सूचनाएं देने वालों का दमन करना चाहा। भारत में सरकार का चरित्र पश्चिम की सरकारों से ज्यादा अनुदार है और इंटरनेट पर पहरा बिठाने की कोशिश यहां भी होगी। इन उम्मीदों, चिंताओं और आशंकाओं को बीच ही मीडिया के संदर्भ में राडिया कांड को देखा और पढ़ा जाना चाहिए।


[i] फिक्की-केपीएमजी की 2010 की रिपोर्ट, 16 मार्च, 2010 की प्रेस रिलीज (यह आंकड़ा 2009 के लिए हैं)। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगले पांच साल में यह क्षेत्र सालाना औसतन 13 फीसदी की दर से बढ़ेगा और 2013 में इसका आकार 1091 अरब रुपए को पार कर जाएगा।
[ii] मार्केटिंग पत्रिका पिच ने दिसंबर, 2010 अंक में बताया है कि मीडिया को साल में 25,000 करोड़ रुपए के विज्ञापन मिलते हैं।
[iii] मीडिया का अंडरवर्ल्ड: पेड न्यूज, कॉरपोरेट और लोकतंत्र, लेखक – दिलीप मंडल, राधाकृष्ण प्रकाशन
[iv] ओपन और आउटलुक ने इन टेपों में दर्ज बातचीत के कई अंश अपनी पत्रिका में छापे हैं। इन पत्रिकाओं की न्यूज साइट पर उन्हें सुना भी जा सकता है।
[v] न्यूज एक्स के कर्ताधर्ता माने जाने वाले जहांगीर पोच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Team Grid – Team Member Showcase WordPress Plugin & Team Editor BWD accordion addon for elementor Custom Fields & Options Plugin for WordPress – Xbox Framework AtoZ SEO Tools – Search Engine Optimization Tools EXA Navigator – Fullscreen Menu for Elementor WooCommerce Customer Specific Pricing Plugin WooCommerce Composite Products | WooCommerce Product Bundles WebViewGold for iOS | Convert website to iOS app | No Code, Push, URL Handling & much more! Teamber | Team Member Collection for Elementor eShop Web – Multi Vendor eCommerce Marketplace / CMS