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‘आत्मज में उतना ही इतिहास है घी में जितना दूध होता है’- विनय कुमार

प्रसिद्ध कवि-मनोचिकित्सक विनय कुमार का काव्य नाटक हाल में आया है ‘आत्मज’। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित यह नाटक वैशाली की प्रसिद्ध नर्तकी आम्रपाली और मगध सम्राट बिंबिसार के कथा सूत्रों के सहारे मानव जीवन के अनेक शाश्वत सवालों से टकराता है, उनको प्रश्नित करता है। इसी नाटक पर उनसे मैंने बातचीत की। आप भी पढ़ सकते हैं- प्रभात रंजन

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प्रश्न- 1 आपको काव्य नाटक लिखने का विचार कैसे आया? और आप ने आम्रपाली और मगध सम्राट बिम्बिसार की कथा क्यों चुनी?

मैंने “आत्मज” की भूमिका में इसका ज़िक्र किया है। क़िस्सा ये है कि मेरी तीसरी काव्य पुस्तक “यक्षिणी” का पटना में मंचन हुआ था। प्रसिद्ध निदेशक संजय उपाध्याय की टीम ने एक अनोखे अन्दाज़ में इसे प्रस्तुत किया था। संजय ने  क्षीण कथा-सूत्रों के सहारे एक प्रभावशाली वितान रचा था। दर्शकों की सराहना भी ख़ूब।  दीर्घा पूरी तरह भरी थी और दर्शकों में  साहित्य, कला और रंगमंच के कई प्रसिद्ध नाम शामिल थे। मैं प्रसिद्ध प्रिंट मेकर श्याम शर्मा और हृषीकेश सुलभ की प्रतिक्रियाएँ सुनते हुए हॉल से बाहर आ रहा था। वह 11 अप्रैल 2021 की बेहद सुहानी शाम थी। हम प्रेमचंद रंगशाला के बाहर ठंडी हवा का लुत्फ़ लेते हुए “यक्षिणी” के बहाने रंगमंच पर बात कर रहे थे। बात “यक्षिणी” की भाषा में विन्यस्त नाट्य-तत्त्वों की चली तो सुलभ जी ने मुझसे  कहा – डॉ साहब, अब आप एक काव्य नाटक लिखिए ….  आप लिख सकते हैं। ….क्या कहता मैं, सो यही कहा – पता नहीं। प्रभात जी, वे कोरोना के दिन थे। हम एक लॉक डाउन से उबर कर दूसरे में घुसने जा रहे थे। बेहद ख़तरनाक डेल्टा वेव के झोंके मुम्बई में उत्पात मचा रहे थे। लेकिन कोविशील्ड लांच हो चुका था। …. तब तो नहीं, मगर अब कह सकता हूँ कि सुलभ जी का वह वाक्य एक क्रिएटिव स्टिमुलस था, एक लौंग एक्टिंग इंजेक्शन, आलस के वायरस से बचाव का वैक्सीन। वह वाक्य  मेरी चेतना के अंतरंग में उतर गया था चुपचाप।

जब यह नाटक लिख रहा था तब इसके सम्भव होने की वजह पर ध्यान क्यों जाता ! लेकिन अब कह सकता हूँ कि   इस नाटक का लिखा जाना इतने भर से मुमकिन नहीं हुआ। अभी हाल में जब हमलोग ए आर एस डी कॉलेज, दिल्ली विवि में मिले थे इस नाटक पर बात करने के लिए, तभी अपनी बात रखने के लिए अपने भीतर झाँका था और मुझे इसके जन्म के कई सूत्र-गुणसूत्र मिले थे। अब मैं आपको बीस साल पीछे लिए चलता हूँ। हुआ यह था कि मैं पटना के के पी जायसवाल इंस्टिट्यूट में अपने मित्र विजय कुमार चौधरी से मिलने गया था। वे वहाँ के निदेशक थे और उनके साथ बैठना मेरे लिए इतिहास के साथ सत्संग  करने जैसा होता था। संयोग की बात कि उस दिन वहाँ ब्रिटिश म्यूजियम के क्यूरेटर आए हुए थे। जब विजय जी ने उनसे मेरा परिचय एक मनोचिकित्सक के रूप में करवाया तो क्यूरेटर महोदय को चुहल सूझी कि हम सब इतिहास और आर्कियोलजी वाले आपके केस हैं। सवाल ये है  – व्हाई डू वी डिग ? फिर बहुत सारी बातें हुईं और मैं इस सवाल के साथ लौट आया। कुछ दिन तक तो यह सवाल  हॉन्ट करता रहा मगर फिर काम-धंधे की आँधी में भीतर के किसी कबाड़ में गुम हो गया। जब “यक्षिणी” के प्रकाशन के बाद इतिहास और कविता के अंतरसंबंधों पर सवाल पूछे गये तो ये गुम हुआ तिनका मेरे मन की आँख में उतर आया, और मैं इस सवाल का जवाब ढूँढते हुए एक लेख लिखने लगा। लेख आज तक अधूरा है। वह तो मेरी जाग्रत स्मृति से ओझल भी था, मगर दिल्ली वाले कार्यक्रम के पहले मुझे जब म्यूजियम वाली घटना की याद आयी तो मुझे उसकी अचानक याद आयी और उसे ढूँढा। मुझे उसमें दो वाक्य मिले, जिन्हें इस नाटक का बीज माना जा सकता है –

 “मैं ही पूछता रहता हूँ अपने इतिहासविद् मित्रों से कि जब अजातशत्रु ने आम्रपाली का चुम्बन लेना चाहा  होगा तो बिंबिसार की प्रेयसी रही नायिका ने क्या सोचा होगा या क्या कहा होगा अपने नवीन धीरोदात्त प्रेमी से ? “

“कोई पंद्रह साल से यह सवाल मेरे भीतर है मगर ग़म ए रोज़गार और ग़म ए इश्क़ (कविता) ने मुझे कभी इससे मिलने का मौक़ा नहीं दिया और आज जब मुझे और आम्रपाली-बिम्बिसार के रोमांस (?) से जन्मे एक पुत्र के बारे में तिनका भर जानकारी मिली है तो मैं विह्वल हो गया हूँ और इस पुराने सवाल से अपनी मुठभेड़ को विवश। “

सनद रहे कि ये दोनों वाक्य मेरी स्मृति में एकदम नहीं थे। मगर ये भी सच है कि इन दो विस्मृत वाक्यों ने मुझे इस नाटक के कलेवर तक पहुँचने में मदद की, ज़ाहिर है मेरे अनजाने में। वैसे भी आम्रपाली और बिम्बिसार तो कथा के आरम्भिक निमित्त भर हैं। और कथा भी क्या ?  बस कुछ सूत्र हैं जिन्हें काव्य-प्रविधि की सलाइयों के सहारे बुन दिया गया है। वे दोनों योजक पात्र  हैं। नायक तो राहुल, विमल, जीवक और कवि नामक तत्त्वों से बना एक  यौगिक पात्र है। लेकिन नाटक के कलेवर में इन दो प्रेमी चरित्रों की भूमिका बेहद ख़ास है। जो भी हो,  हमें याद रखना चाहिए, कलेवर ही कथ्य नहीं होता।

2 आपने इस नाटक का नाम आत्मज रखा है। इस नाम तक आप किस तरह पहुँचे? 

जब यह काव्य नाटक पूरा हुआ तो मेरे दिमाग़ में बतौर नाम “पितृहीन” शब्द आया। मैंने अपने कवि मित्र कुमार मुकुल से इसकी चर्चा भी की। वे इसके पहले ड्राफ्ट से गुज़र चुके थे। उन्हें यह नाम नहीं रुचा और गुरु जी की तरह मुझे टास्क दिया – कोई और नाम सोचिए।  मुझे कुछ और सूझ नहीं रहा था। …. पहला ड्राफ्ट मैंने प्रसिद्ध उपन्यासकार  मनीषा कुलश्रेष्ठ को भी भेजा था। उन्हें टेक्स्ट मेसेज भेजा – इसका नाम “पितृहीन” रखें या “अप्प पिता भव”। जवाब आया – दोनों ख़ारिज, जँच नहीं रहे। थोड़ी देर बाद मेसेज आया – “आत्मज”। मैंने भूमिका में लिखा है  कि मैं चौंक गया –  कथा की मुँडेर पर बैठा यह शब्द क्यों नहीं दिख रहा था मुझे। आत्मज ! इस एक शब्द ने न सिर्फ़ सारे पात्रों और उनकी विडम्बनाओं को संज्ञापित किया बल्कि रचना के सम्भव होने को भी नाम दिया।

3 आपको कविताओं में इतने प्रयोगों की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? 

कुछ तो परम्परा से और कुछ शायद अपनी तबीयत से।  तो पहले परम्परा की बात करते हैं। कोई नयी बात तो नहीं, मगर दुहराना चाहूँगा कि भारत में  कविता की परम्परा बड़ी समृद्ध है। हमारे पुरखों ने हमें रामचरितमानस जैसा  तरल महाकाव्य भी दिया है और महाभारत जैसा जटिल गुंजल भी। हमारे पास कालिदास हैं जिनके यहाँ प्रकृति का मन और मन  की प्रकृति के अर्थपूर्ण छंद हैं, तो हमारे यहाँ रवींद्र भी हैं जो  अपनी बात कहने के लिए भाषा के बाहर भी जाते हैं। हिन्दी कविता में भी कितने रंग और  कितने प्रयोग दिखते हैं। काफ़ी लोग परम्परा को  जड़ता से जोड़ते हैं और नाक-भौं सिकोड़ते हैं, मगर मैं जब परम्परा में बिखरे हुए वैविध्य को देखता हूँ,  न सिर्फ़ मुग्ध रह जाता हूँ बल्कि ख़ुद को नये खेल के लिए प्रेरित भी महसूस करता हूँ।

प्रभात जी, हर कवि किसी अज्ञात महादेश  का यात्री  होता है (अगर वो जेन्युइन कवि है तो)।  यह उस के ऊपर निर्भर है कि वह अपना पाथेय घर से लेकर चलता है या स्विगी को कहता कि भाई एक इटालियन पिज़्ज़ा या मेक्सिकन  केसाडिया  ला दे। अपने गाँवों में एक कहावत है – घर से खाकर चलोगे तो बाहर भी खाने को मिलेगा। मैंने अपने जीवन में इस लोक-अनुभूत स्थापना का अनुभव कई बार किया है। इसलिए रचना-यात्रा में भी मैं घर से पाथेय लेकर चलने का आग्रही हूँ; लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हज़ारों सालों से सजी और समृद्ध  ग्लोबल ज्मंडी के फ़ूड कोर्ट्स से कोई परहेज़ बरतता हूँ। अन्य देशों-महादेशों की ज्ञान-सम्पदा में बहुत कुछ है जो देखने-परखने-सीखने लायक़ है, पर कविता तो मातृभाषा में ही लिखी जा सकती है न, इसलिए मुझे लगता है कि अपनी परम्परा का  बोध और उसका सम्मान आवश्यक है। एक  रचनात्मक औचित्य है इसका। अब अगर इसमें किसी को राजनीतिक औचित्य की बू आती है तो आए।

अब आते हैं अपनी तबीयत पर। याद होगा आपको, दिनकर कहा करते थे, लिखा भी है उन्होंने कि भावों की मरोड़ से छंद पैदा होते हैं। दिनकर के यहाँ कितने सारे प्रयोग हैं। डायरी काव्य तक। शमशेर यूँ ही नहीं शायराना होते थे। हर बात , हर विचार आप एक फॉर्मेट में नहीं कह सकते। कुछ बातें कहने के लिए आपको उर्दू के क़रीब भी जाना पड़ता है। मैं जो बातें ग़ज़ल के फॉर्मेट में कह पाता हूँ उन्हें द्रुतविलम्बित छंद में नहीं कह सकता। मेरी अगली  किताब “श्रेयसी” में एक उर्दू नज़्म है , एक सौ साठ पंक्तियों की। मैं उसे मुक्तछंद में नहीं कह सकता था।  अब ‘आत्मज’ में ही देखिए। इसमें छोटे-बड़े चार गीत हैं। संवादों में भी लय है।   और बात सिर्फ़  भाव की भी नहीं है। कोई  बिम्ब या कोई  विचार आया और आपने उसे कविता के फॉर्मेट में रख दिया, यह एक बात है मगर जब कविता अचेतन की आँधियों से फूट रही हो, तब क्या करेंगे आप ? आपको एक ऐसे फॉर्मेट की तलाश करनी होगी जिसमें आँधी मनुष्य की साँस बनकर बस सके। ‘यक्षिणी’ ऐसी ही आँधी की उपज है।  एक लम्बी श्रृंखला लिखने के अलावा कोई चारा नहीं था मेरे पास। बमुश्किल उस आँधी को एक लय दे पाया। छंद में तो कमबख़्त आ ही नहीं सकती थी।   थी।

‘आत्मज’ के समय भी ऐसा ही हुआ। जो अंतस् में था वह बाहर आ ही नहीं रहा था।मगर जैसे ही मैंने अपने को फ़्रायडियन काउच पर लिटाया, ऑटो साइकोएनालिसिस शुरू हो गया और राहुल बाहर आया, देवदूतों से घिरा। अब मेरे सामने एक दृश्य था और आगे मुझे नाटक दिखने लगा था। मेरी आनेवाली किताब ‘श्रेयसी’ तो और भी लम्बी श्रृंखला है, और उसमें भाषा और फॉर्म के स्तर पर कई तरह के प्रयोग हैं। अमूमन एक किताब में भाषा का एक मूड होता है, एक तेवर लेकिन क्या करे कवि अगर कोई विचार-यात्रा आवारगी पर उतर आए और आवारगी भी ऐसी जो बेतुकी न हो।। कुछ विषय ऐसे होते हैं भाई जो एक फॉर्मेट में नहीं आ पाते। इन हालात में प्रयोग होते चले जाते हैं।

4 जब आप ‘आत्मज’ लिख रहे थे तो आपके दिमाग़ में दिनकर थे या धर्मवीर भारती या कोई नहीं? 

प्रभात जी, मेरे दिमाग़ में तो कथा-प्रवाह तक नहीं था। मैं तो संवाद-दर-संवाद, अंक -दर -अंक आगे बढ़ रहा था। यह मेरे लिये एक सकारात्मक  संयोग था कि उर्वशी और  अंधायुग दोनों ही क्लासिक मेजर्स मैंने पिछली शताब्दी में ही पढ़े थे।  इसलिए मुझे लगता है कि मैं उनके तात्कालिक प्रभाव से बच  पाया हूँ। वैसे यह कहनेवाला भी कौन होता हूँ मैं। यह तो साहित्य के डोमेन के स्वनामधन्य या भावी गेटकीपर्स तय करेंगे।  आपके सवाल के जवाब में मैं इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि  कि मेरे मन के चेतन  हिस्से में कोई मॉडल नहीं था, लेकिन यह कहना भी बेईमानी होगी कि ये पूर्वज मेरे अचेतन में भी नहीं थे। हम पुरखों की तरह मूँछें भले न रखें, उनकी झाईं से कैसे बच सकता है कोई।

प्रकट तौर पर भले मेरे ध्यान में इनमें से कोई भी नहीं था मगर दिनकर और धर्मवीर भारती के रचना-संसार में एक जिज्ञासु बालक और उत्सुक किशोर की तरह बरसों दौड़ता रहा हूँ।  काव्य नाटक  ‘अंधायुग’ अपने सार्वकालिक-सार्वभौमिक अंतर्वस्तु और प्रवहमान भाषा के कारण मुझे बहुत पसंद है, और प्रेम-काम-मातृत्व की विशद त्रिवेणी को उदात्त गाथा में समेटती ‘उर्वशी’ भी। इस श्रृंखला में मैं नरेश मेहता की काव्य कृति “संशय की एक रात” का नाम भी लेना चाहूँगा।

 

5 आत्मज में कितना इतिहास है, कितना गल्प और कितनी कल्पना? 

 

आत्मज में उतना ही इतिहास है घी में जितना दूध होता है।

….पटना में एक बार मैंने “साहित्य में इतिहास” विषय पर एक दिन-भर का कार्यक्रम आयोजित किया था। उसमें एक सत्र की अध्यक्षता करते हुए नंदकिशोर नवल जी ने कहा था – साहित्य में आए इतिहास का भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि साहित्यकार जब “रघुवर के विमल यश का वर्णन करता है तो निज मन के मुकुर में सुधार कर करता है।”  और क्यों न करे ? इतिहास का पुनर्लेखन उसका काम ही नहीं। उसे तो अपने समय में जीना-मरना और लिखना है। पाठक भी उसके बीते कल के नहीं, ज़्यादातर तो आने वाले कल के होते हैं। ‘आत्मज’ के साथ भी यही हुआ है। यहाँ इतिहास का आलम्बन भर है। आत्मज के पात्र नाम और संदर्भ के दृष्टिकोण से इतिहास के हैं, मगर वे नाटक में इतिहास के पन्नों से नहीं कवि के मानस से उठकर आते हैं। वे कवि की भीतरी लाइब्रेरी से आते हैं। उनका वजूद फैक्ट्स और फ़िगर्स के आधार पर नहीं बना है। परसेप्शन भी एक  चीज़ है, जो तथ्यों की प्रोसेसिंग के बाद आकार लेता है, और यह प्रोसेसिंग कल के लैब में नहीं, आज के लैब में होती है। सब के लैब्स भी एक नहीं।  स्वभाव और ज्ञान के उत्प्रेरक भी अपनी भूमिका निभाते हैं। किसी के लिए अशोक महान शासक  है, किसी के लिए देवानाम-प्रिय तो किसी के लिए  जातीय अस्मिता का एक टूल। आत्मज के ये पात्र भी प्रोसेस्ड हैं। इन्हें इतिहास में ठीक इसी रूप में पाना मुश्किल होगा। इतिहास के प्रोफ़ेसर इन्हें पचा लें यही बहुत होगा। इतिहास में राहुल कहीं नहीं बोलता। विमल और अजातशत्रु सौतेले भाई हैं मगर दोनों में मुलाक़ात या बातचीत कहीं नहीं दर्ज। आम्रपाली के अंतरग तक जाने की सुविधा किस इतिहासकार के पास? दरअसल ये हमारे समय के लोग हैं जिन्हें इतिहास की सूचनाओं के धागों से बुना गया है। मैंने इनके नामों की डेनोटेटिव कैपेसिटी का इस्तेमाल किया है। ये अपने ऐतिहासिक स्वरूप में अवतरित अवश्य होते हैं मगर बोलते हैं कवि की  प्रॉम्प्टिंग पर। …..जब मेरे इतिहासविद् मित्र

विजय चौधरी ने इसे पढ़ा और अपना इम्प्रेशन साझा करने लगे तो मैंने पूछा – आप यह बताइए कि मेरे नाटक के पात्र जो बोलते-करते हैं वह उनके इतिहास-सम्मत चरित्र से मैच करता है या नहीं ?  विजय जी ने हँसकर कहा था – बिलकुल करता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो  इतिहास-विरुद्ध हो।मुझे तो आश्चर्य हो रहा कि आप इनके मन तक पहुँचे कैसे !” प्रभात जी, इस  नाटक में इतिहास के  मौन का इस्तेमाल किया है मैंने। उसकी चुप्पियों की कविता लिखी है। इतिहास तो अशोक के हृदय परिवर्तन को एक वाक्य में लिखकर चुप हो जाता है। सबूत के रूप में  उसके शिलालेख पढ़कर सुना देता है। उसके मन की बात तो कवि ही लिख सकता है, और जब कवि लिखेगा तो वह अपने भीतर के और अपने समय के अशोक को ज़्यादा लिखेगा। इतिहास के आलम्बन पर लिखे काव्य की समकालीनता यही है। कवि अगर मूर्ख क़िस्म का चारण नहीं तो ऐसी हर कविता समकालीन ही होगी। दरअसल वह इतिहास को मिथक के स्पेस में ले जाता है , डेलिब्रेटली नहीं ऑटोमैटिकली, एफर्टलेस्ली। “आत्मज” में यह कितना हुआ है यह आप जैसे मर्मज्ञ तय करेंगे

6 “आत्मज” के माध्यम से आप क्या कहना चाहते हैं?

कोई एक बात कहना मेरे स्वभाव में नहीं। दरअसल एक से अधिक बात कहना कविता की प्रकृति है। नियति है उसकी। आत्मज भी मूलत: काव्य है इसलिए यहाँ भी यही हुआ है। हर पात्र एक से अधिक बात कहना चाहता है। सबके चरित्र में कुछ न कुछ जटिलता है। सब अपने concrete  persona से बाहर आते हैं और काव्य के स्पेस में अमूर्त ढंग से आकार लेते हैं। सब अँधेरे से आते और अँधेरे में गुम हो जाते हैं और अगले अंकों  में उनकी दैहिक उपस्थिति नहीं रहती, मगर उनके संवाद की अन्तर्ध्वनियाँ रहती हैं।आपने नाटक पढ़ा है इसलिए मुझे यक़ीन हैं, आप इसकी तस्दीक़ करेंगे कि इन्हीं अन्तर्ध्वनियों से एक धागा बनता है जो सबको गूँथता है। यह  धागा अभाव का धागा है – पिता की पूर्ण या आंशिक अनुपस्थिति का। यह अनुपस्थिति किसी को राहुल बनाती है, किसी को आम्रपाली, किसी को विमल, किसी को अजातशत्रु और किसी को जीवक। अभाव के इस धागे से कोई नहीं बचता। पूर्ण पिता किसी के भाग्य में नहीं। कोई समाज, कोई राष्ट्र नहीं ऐसा जिसे पूर्ण पिता मिला हो। हमारे घोषित राष्ट्रपिता भी सबके पिता नहीं हो सके। और तो और अपने बड़े बेटे के भी नहीं। …. तो पितृहीनता एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि इसके निहितार्थ वैयक्तिक से अधिक सामाजिक और राजनीतिक हैं।

एक और बात जो इसे लिखते समय मेरे संज्ञान में आई।  भाव को ही नहीं,  अभाव को भी एक हद तक इन्हेरिट करते हैं  आप। सच तो यही कि इस विर्से ने ही मुझे “आत्मज” का कवि बनाया और यह बात मैं यह काव्य नाटक लिखकर ही जान पाया। मेरा इशारा जीवक और कवि के बीच हुए साइकोएनालिटिक डायलॉग की तरफ़ है।

अंतिम बात यह कि “मैं क्या कहना चाहता हूँ” पर भारी पड़ती है वह बात जो पाठक और दर्शक ग्रहण करते हैं। और फिर आलोचक भी तो हैं, वे भी तो खोदेंगे और खोजेंगे।

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